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View Full Version : मशहूर शायरों की दिलफरेब ग़ज़लें



Akhand
03-03-2011, 07:32 AM
हिन्दी, उर्दू और हिन्दी में अनूदित काव्य के इस विशाल संकलन में आपका स्वागत है। यह एक खुली परियोजना है जिसके विकास में कोई भी भाग ले सकता है -आप भी! आपसे निवेदन है कि आप भी इस संकलन के परिवर्धन में सहायता करें।

Akhand
03-03-2011, 07:33 AM
अफ़्सोस है गुल्शन ख़िज़ाँ लूट रही है
शाख़े-गुले-तर सूख के अब टूट रही है

इस क़ौम से वह आदते-देरीनये-ताअत
बिलकुल नहीं छूटी है मगर छूट रही है

Akhand
03-03-2011, 07:35 AM
ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते
सच है कि हमीं दिल को संभलने नहीं देते

आँखें मुझे तल्वों से वो मलने नहीं देते
अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते

किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल[1]
तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते

परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले
क्यों हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते

हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़-ए-तमन्ना
दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते

दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़[2] है हर वक़्त
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते

गर्मी-ए-मोहब्बत में वो है आह से माअ़ने
पंखा नफ़स-ए-सर्द[3] का झलने नहीं देते

शब्दार्थ:

↑ मिलन की रात
↑ भरा हुआ
↑ ठंडी सांस

Akhand
03-03-2011, 07:36 AM
आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे
आप क्यों चुप हैं ये हैरत है मुझे

शायरी मेरे लिए आसाँ नहीं
झूठ से वल्लाह नफ़रत है मुझे

रोज़े-रिन्दी[1] है नसीबे-दीगराँ[2]
शायरी की सिर्फ़ क़ूवत[3] है मुझे

नग़मये-योरप से मैं वाक़िफ़ नहीं
देस ही की याद है बस गत मुझे

दे दिया मैंने बिलाशर्त उन को दिल
मिल रहेगी कुछ न कुछ क़ीमत मुझे

शब्दार्थ:

↑ शराब पीने का दिन
↑ दूसरों की क़िस्मत में
↑ ताक़त

Akhand
03-03-2011, 07:38 AM
उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है और गाने की आदत भी
निकलती हैं दुआऐं उनके मुंह से ठुमरियाँ होकर

तअल्लुक़ आशिक़-ओ-माशूक़ का तो लुत्फ़ रखता था
मज़े अब वो कहाँ बाक़ी रहे बीबी मियाँ होकर

न थी मुतलक़ तव्क़्क़ो बिल बनाकर पेश कर दोगे
मेरी जाँ लुट गया मैं तो तुम्हारा मेहमाँ होकर

हक़ीक़त में मैं एक बुलबुल हूँ मगर चारे की ख़्वाहिश में
बना हूँ मिमबर-ए-कोंसिल यहाँ मिट्ठू मियाँ होकर

निकाला करती है घर से ये कहकर तू तो मजनूं है
सता रक्खा है मुझको सास ने लैला की माँ होकर

Akhand
03-03-2011, 07:41 AM
एक बूढ़ा नहीफ़-ओ-खस्ता दराज़
इक ज़रूरत से जाता था बाज़ार
ज़ोफ-ए-पीरी से खम हुई थी कमर
राह बेचारा चलता था रुक कर
चन्द लड़कों को उस पे आई हँसी
क़द पे फबती कमान की सूझी
कहा इक लड़के ने ये उससे कि बोल
तूने कितने में ली कमान ये मोल
पीर मर्द-ए-लतीफ़-ओ-दानिश मन्द
हँस के कहने लगा कि ए फ़रज़न्द
पहुँचोगे मेरी उम्र को जिस आन
मुफ़्त में मिल जाएगी तुम्हें ये कमान

Akhand
03-03-2011, 07:44 AM
कट गई झगड़े में सारी रात वस्ल-ए-यार की
शाम को बोसा लिया था, सुबह तक तक़रार की

ज़िन्दगी मुमकिन नहीं अब आशिक़-ए-बीमार की
छिद गई हैं बरछियाँ दिल में निगाह-ए-यार की

हम जो कहते थे न जाना बज़्म में अग़यार[1] की
देख लो नीची निगाहें हो गईं सरकार की

ज़हर देता है तो दे, ज़ालिम मगर तसकीन[2] को
इसमें कुछ तो चाशनी हो शरब-ए-दीदार की

बाद मरने के मिली जन्नत ख़ुदा का शुक्र है
मुझको दफ़नाया रफ़ीक़ों[3] ने गली में यार की

लूटते हैं देखने वाले निगाहों से मज़े
आपका जोबन मिठाई बन गया बाज़ार की

थूक दो ग़ुस्सा, फिर ऐसा वक़्त आए या न आए
आओ मिल बैठो के दो-दो बात कर लें प्यार की

हाल-ए-'अकबर' देख कर बोले बुरी है दोस्ती
ऐसे रुसवाई, ऐसे रिन्द, ऐसे ख़ुदाई ख़्वार की

शब्दार्थ:

↑ ग़ैर
↑ तसल्ली
↑ दोस्तों

Akhand
03-03-2011, 07:53 AM
कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में इसकी मुश्क़िल है ।
यहाँ परियों का मजमा है, वहाँ हूरों की महफ़िल है ।

इलाही कैसी-कैसी सूरतें तूने बनाई हैं,
हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है।

ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा,
मैं कहता रह गया ज़ालिम मेरा दिल है, मेरा दिल है ।

जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुँझलाकर,
अरे तू कौन है, हट सामने से क्यों मुक़ाबिल है ।

हज़ारों दिल मसल कर पाँवों से झुँझला के फ़रमाया,
लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है ।

Akhand
03-03-2011, 07:55 AM
किस-किस अदा से तूने जलवा दिखा के मारा
आज़ाद हो चुके थे, बन्दा बना के मारा

अव्वल[1] बना के पुतला, पुतले में जान डाली
फिर उसको ख़ुद क़ज़ा[2] की सूरत में आके मारा

आँखों में तेरी ज़ालिम छुरियाँ छुपी हुई हैं
देखा जिधर को तूने पलकें उठाके मारा

ग़ुंचों में आके महका, बुलबुल में जाके चहका
इसको हँसा के मारा, उसको रुला के मारा

सोसन[3] की तरह 'अकबर', ख़ामोश हैं यहाँ पर
नरगिस में इसने छिप कर आँखें लड़ा के मारा

शब्दार्थ:

↑ पहले
↑ मौत
↑ एक कश्मीरी पौधा

Akhand
03-03-2011, 08:00 AM
कोई हँस रहा है कोई रो रहा है
कोई पा रहा है कोई खो रहा है

कोई ताक में है किसी को है गफ़लत
कोई जागता है कोई सो रहा है

कहीँ नाउम्मीदी ने बिजली गिराई
कोई बीज उम्मीद के बो रहा है

इसी सोच में मैं तो रहता हूँ 'अकबर'
यह क्या हो रहा है यह क्यों हो रहा है

Akhand
03-03-2011, 08:02 AM
ख़ुशी है सब को कि आप्रेशन में ख़ूब नश्तर[1] चल रहा है
किसी को इसकी ख़बर नहीं है मरीज़ का दम निकल रहा है

फ़ना[2] उसी रंग पर है क़ायम, फ़लक वही चाल चल रहा है
शिकस्ता-ओ-मुन्तशिर[3] है वह कल, जो आज साँचे में ढल रहा है

यह देखते ही जो कासये-सर[4], गुरूरे-ग़फ़लत[5] से कल था ममलू[6]
यही बदन नाज़ से पला था जो आज मिट्टी में गल रहा है

समझ हो जिसकी बलीग़[7] समझे, नज़र हो जिसकी वसीअ[8] देखे
अभी तक ख़ाक भी उड़ेगी जहाँ यह क़ुल्जुम[9] उबल रहा है

कहाँ का शर्क़ी[10] कहाँ का ग़र्बी[11] तमाम दुख-सुख है यह मसावी[12]
यहाँ भी एक बामुराद ख़ुश है, वहाँ भी एक ग़म से जल रहा है

उरूजे-क़ौमी ज़वाले-क़ौमी, ख़ुदा की कुदरत के हैं करिश्मे
हमेशा रद्द-ओ-बदल के अन्दर यह अम्र पोलिटिकल रहा है

मज़ा है स्पीच का डिनर में, ख़बर यह छपती है पॉनियर में
फ़लक की गर्दिश[13] के साथ ही साथ काम यारों का चल रहा है
शब्दार्थ:

↑ चाकू, काँटा
↑ लुप्त हो जाना
↑ टूटा हुआ और बिखरा हुआ
↑ सर का प्याला
↑ अज्ञान का घमण्ड
↑ भरा हुआ
↑ अर्थपूर्ण
↑ फैला हुआ
↑ समुद्र
↑ पूर्वी
↑ पश्चिमी
↑ बराबर क़ौम का उत्थान और पतन
↑ आसमान का चक्कर या फेरा

sushilnkt
03-03-2011, 10:51 AM
मासाअला बहुत ही सुंदर हे आप की सायरी

SUNIL1107
03-03-2011, 12:43 PM
बहुत ही उम्दा संग्रह है मित्र अखंड जी ! धन्यवाद

Akhand
04-03-2011, 06:20 AM
ख़ैर उनको कुछ न आए फाँस लेने के सिवा
मुझको अब करना ही क्या है साँस लेने के सिवा

थी शबे-तारीक, चोर आए, जो कुछ था ले गए
कर ही क्या सकता था बन्दा खाँस लेने के सिवा

Akhand
04-03-2011, 06:23 AM
गाँधी तो हमारा भोला है, और शेख़ ने बदला चोला है
देखो तो ख़ुदा क्या करता है, साहब ने भी दफ़्तर खोला है
आनर की पहेली बूझी है, हर इक को तअल्ली सूझी है
जो चोकर था वह सूजी है, जो माशा था वह तोला है
यारों में रक़म अब कटती है, इस वक़्त हुकूमत बटती है
कम्पू से तो ज़ुल्मत हटती है, बे-नूर मोहल्ला-टोला है

Akhand
04-03-2011, 06:47 AM
चश्मे जहाँ से हालते असली नहीं छुपती
अख्बार में जो चाहिए वह छाप दीजिए

दावा बहुत बड़ा है रियाजी मे आपको
तूले शबे फिराक को तो नाप दीजिए

सुनते नहीं हैं शेख नई रोशनी की बात
इंजन कि उनके कान में अब भाप दीजिए

जिस बुत के दर पे गौर से अकबर ने कह दिया
जार ही मैं देने लाया हूँ जान आप दीजिए

Akhand
04-03-2011, 07:05 AM
जान ही लेने की हिकमत[1] में तरक़्क़ी देखी
मौत का रोकने वाला कोई पैदा न हुआ

उसकी बेटी ने उठा रक्खी है दुनिया सर पर
ख़ैरियत गुज़री कि अंगूर के बेटा न हुआ

ज़ब्त से काम लिया दिल ने तो क्या फ़ख़्र करूँ
इसमें क्या इश्क की इज़्ज़त थी कि रुसवा न हुआ

मुझको हैरत है यह किस पेच में आया ज़ाहिद
दामे-हस्ती[2] में फँसा, जुल्फ़ का सौदा[3] न हुआ
शब्दार्थ:

↑ विधि
↑ जीवन रूपी जाल
↑ आशिक

Akhand
04-03-2011, 07:06 AM
जो यूं ही लहज़ा-लहज़ा दाग़-ए-हसरत की तरक़्क़ी है
अजब क्या, रफ्ता-रफ्ता मैं सरापा सूरत-ए-दिल हूँ

मदद-ऐ-रहनुमा-ए-गुमरहां इस दश्त-ए-गु़र्बत में
मुसाफ़िर हूँ, परीशाँ हाल हूँ, गु़मकर्दा मंज़िल हूँ

ये मेरे सामने शेख-ओ-बरहमन क्या झगड़ते हैं
अगर मुझ से कोई पूछे, कहूँ दोनों का क़ायल हूँ

अगर दावा-ए-यक रंगीं करूं, नाख़ुश न हो जाना
मैं इस आईनाखा़ने में तेरा अक्स-ए-मुक़ाबिल हूँ

Akhand
04-03-2011, 07:10 AM
'आए भी वो गए भी वो'--गीत है यह, गिला नहीं
हमने य' कब कहा भला, हमसे कोई मिला नहीं।

आपके एक ख़याल में मिलते रहे हम आपसे
यह भी है एक सिलसिला गो कोई सिलसिला नहीं।

गर्मे-सफ़र हैं आप तो हम भी हैं भीड़ में कहीं
अपना भी काफ़िला है कुछ आप ही का काफ़िला नहीं।

दर्द को पूछते थे वो, मेरी हँसी थमी नहीं
दिल को टटोलते थे वो, मेरा जिगर हिला नहीं।

आई बहार हुस्न का ख़ाबे-गराँ लिए हुए :
मेरे चमन कि क्या हुआ, जो कोई गुल खिला नहीं।

उसने किए बहुत जतन, हार के कह उठी नज़र :
सीनए-चाक का रफ़ू हमसे कभी सिला नहीं।

इश्क़ की शाइरी है ख़ाक़, हुस्न का ज़िक्र है मज़ाक
दर्द में गर चमक नहीं, रूह में गर जिला नहीं

कौन उठाए उसके नाज़, दिल तो उसी के पास है;
'शम्स' मज़े में हैं कि हम इश्क़ में मुब्तिला नहीं।

Akhand
04-03-2011, 07:15 AM
‘अनमोल’ अपने आप से कब तक लड़ा करें
जो हो सके तो अपने भी हक़ में दुआ करें

हम से ख़ता हुई है कि इंसान हैं हम भी
नाराज़ अपने आप से कब तक रहा करें

अपने हज़ार चेहरे हैं, सारे हैं दिलनशीं
किसके वफ़ा निभाएं हम किससे जफ़ा करें

नंबर मिलाया फ़ोन पर दीदार कर लिया
मिलना सहल हुआ है तो अक्सर मिला करें

तेरे सिवा तो अपना कोई हमज़ुबां नहीं
तेरे सिवा करें भी तो किस से ग़िला करें

दी है कसम उदास न रहने की तो बता
जब तू न हो तो कैसे हम ये मोजिज़ा करें

Akhand
04-03-2011, 07:17 AM
'मोमिन' सू-ए-शर्क़ उस बुते-क़ाफ़िर का तो घर है
हम सिजदा किधर करते हैं और का'बा किधर है

हसरत अगर मैं देखूँ तो फ़लक़ क्योंकर न हो राम
उस नरगिसे-जादू को निगह पेशे-नज़र है

ख़त की मुझे क़ासिद को है ईनाम की ख़ाहिश
मैं दस्तनिगर1 ख़ुद हूँ, वह क्या दस्तनिगर है

अरमान निकलने दे बस ऐ बीमे-नज़ाकत2
हाँ हाथ तसव्वुर में मेरा ज़ेरे-कमर है

रिन्दों पे यह बेदाद ख़ुदा से नहीं डरता
ऐ मुहतसिब ऐसा तुझे क्या शाह का डर है

ऐसे दमे-आराम असर-ख़ुफ़्ता3 कब उठा
हमको अबस उम्मीद दुआहाए-सहर है

हम हाल कहे जायेंगे सुनिये कि न सुनिये
इतना ही तो याँ सुहबते-नासेह का असर है

वह ज़िबह करें और यहाँ जान फ़िदा हो
ऐसे से निभे यूँ यह हमारा ही जिगर है

अब नहीं जाती तेरे आ जाने की उम्मीद
गो फिर गयीं आँखें पर निगाह जानिबे-दर है

शब्दार्थ:
1. निर्धन, 2. नरमी का डर, 3. सुप्त प्रभाव

Rihan Hasan
04-03-2011, 03:28 PM
बेहतरीन शायरी पेश की है दोस्त लगे रहो

Akhand
05-03-2011, 05:42 AM
'सौदा' गिरफ़्ता-दिल को न लाओ सुख़न के बीच
जूँ-ग़ुँचा सौ ज़बान है उसके दहन के बीच

पानी हो बह गये मिरे आज़ा नयन की राह
बाक़ी है जूँ-हुबाब नफ़स पैरहन के बीच

जिनने न देखी हो शफ़क़े-सुब्ह की बहार
आकर तेरे शहीद को देखे कफ़न के बीच

वो ख़ारे-सुर्ख़-रू नहीं अहले-जुनूँ के पास
पाबोस को मिरी जो न पहुँचा हो बन के बीच

आतिशकदे में देख कि शोला है बेक़रार
आराम दिलजलों को नहीं है वतन के बीच

बाद-अज़-शबाब हों तिरी अँखियाँ ज़ियादा मस्त
होता है ज़ोरे-कैफ़ शराबे-कुहन के बीच

'सौदा' मैं अपने यार से चाहा कि कुछ कहूँ
वैसी की इक निगह कि रही मन की मन के बीच

शब्दार्थ:
सुख़न = बातचीत ;जूँ-ग़ुँचा = कली की तरह ;दहन = मुँह ;आज़ा = अंग ;जूँ-हुबाब = बुलबुले की तरह ;नफ़स = साँस ;पैरहन = वस्त्र ;शफ़क़े-सुब्ह = उषा ;ख़ारे-सुर्ख़-रू = लाल हो चुका काँटा; पाबोस = पाँव चूमने के लिए ;बाद-अज़-शबाब = जवानी आने के बाद ;ज़ोरे-कैफ़ = मस्ती का ज़ोर ;शराबे-कुहन = पुरानी शराब

Akhand
05-03-2011, 05:43 AM
'सौदा' से कहा मैंने, क्यों तुझसे न कहते थे
लब इश्क़ के साग़र से ज़ालिम न कर आलूदा1

अब देख तो हाल अपना टुक2 रहम की नज़रों से
नाहक़ की बला में तू है किस क़दर आलूदा

आँखें तिरी रखती हैं दामानो-गरीबाँ3 को
ख़ूँनाब4 के क़तरों से से शामो-सहर5 आलूदा

जिस सिम्त6 निगह कीजे ऊधर नज़र आता है
लोहू से तिरे सर की दीवारो-दर आलूदा

जब मैं तुझे समझाकर रो-रो इन्हें धोता हूँ
कहता है न होवेगा बारे-दिगर7 आलूदा

लेकिन ये नसीहत है बेफ़ायदा, क्या हासिल
ये है कि उधर धोया, वो हैं उधर आलूदा

इस बात में ऐ नादाँ, बतला तो मज़ा क्या है
पाँवों से जो तू ख़ूँ में है ता-ब-सर8 आलूदा

जिस वक़्त ग़रज़ उनने ये बात सुनी मुझसे
इतना ही कहा भरकर आहे-असर-आलूदा9

लज़्ज़त को हलाहल की क्या उनको बताऊँ मैं
है कामो-दहन10 जिनका शहदो-शकर-आलूदा

शब्दार्थ
1. दूषित, 2. ज़रा, 3. दामन और गरबान, 4. रक्त, 5. सुबह-शाम, 6. तरफ़, 7. दूसरी बार, 8. सर तक, 9. असर रखने वाली आह, 10. होंठ और मुँह

Akhand
05-03-2011, 05:45 AM
है दुनिया की कुछ परवा ,न कुछ अच्छा बुरा जाने
कोई समझे क़लंदर[1] उस को और कोई गदा[2] जाने

मदद से असलहों[3] की जो दुकां अपनी चलाता है
मुहब्बत, दोस्ती, एहसास, जज़्बा, फ़िक्र क्या जाने?

जिया जो दूसरों के वास्ते है बस वही इंसां
कि अपने वास्ते जीने को वो अपनी क़ज़ा[4] जाने

फ़राएज़[5] की जगह ऊँची न होगी जब तलक हक़ से
तो दुनिया भी तेरी बातों को गूंगे की सदा जाने

सऊबत[6] ज़िंदगी का हर सबक़ ऐसे सिखाती है
कि नादारी[7] में भी इंसान जीने की अदा जाने

नज़र में उन की गर मज़हब है इक शतरंज का मोहरा
तो फिर अंजाम कैसा, क्या, कहाँ होगा ख़ुदा जाने

वफ़ादारी ही जिस की ज़ात का हिस्सा रही बरसों
मगर ये क्या हुआ कि आज वो इस को सज़ा जाने

न जाने किस ज़माने में ’शेफ़ा’ वो शख़्स जीता है
जो ख़ुद्दारी[8], रवादारी[9], मिलनसारी, वफ़ा जाने

शब्दार्थ:

↑ फ़क़ीर
↑ भिखारी, भिक्षुक
↑ हथियार
↑ मृत्यु, मौत
↑ कर्तव्य, फ़र्ज़, नमाज़
↑ कठिनता, कष्ट, दुश्वारी, पीड़ा, व्यथा, तकलीफ़
↑ ग़रीबी, दरिद्रता, मुफ़लिसी, निर्धनता
↑ स्वाभिमान, आत्मगौरव, आत्मसम्मान
↑ सहृदयता, उदारता

Akhand
05-03-2011, 05:47 AM
हाथ में लेकर खड़ा है बर्फ़ की वो सिल्लियाँ
धूप की बस्ती में उसकी हैं यही उपलब्धियाँ

आसमा की झोपड़ी में एक बूढ़ा माहताब
पढ़ रहा होगा अँधेरे की पुरानी चिट्ठियाँ

फूल ने तितली से इकदिन बात की थी प्यारकी
मालियों ने नोंच दीं उस फूल की सब पत्तियाँ

मैं अंगूठी भेंट में जिस शख़्स को देने गया
उसके हाथों की सभी टूटी हुई थी उँगलियाँ

Akhand
05-03-2011, 05:48 AM
अँधेरे चंद लोगों का अगर मक़सद नहीं होते

यहाँ के लोग अपने आप में सरहद नहीं होते


न भूलो, तुमने ये ऊँचाईयाँ भी हमसे छीनी हैं

हमारा क़द नहीं लेते तो आदमक़द नहीं होते


फ़रेबों की कहानी है तुम्हारे मापदण्डों में

वगरना हर जगह बौने कभी अंगद नहीं होते


तुम्हारी यह इमारत रोक पाएगी हमें कब तक

वहाँ भी तो बसेरे हैं जहाँ गुम्बद नहीं होते


चले हैं घर से तो फिर धूप से भी जूझना होगा

सफ़र में हर जगह सुन्दर— घने बरगद नही होते

Akhand
05-03-2011, 05:55 AM
अँधेरे चारों तरफ़ सायं-सायं करने लगे
चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे

तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर
ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे

लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे

ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू
बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले
वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे

अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी
सफ़ेद पोश उठे काएँ-काएँ करने लगे

Akhand
05-03-2011, 05:57 AM
अँधेरों की सियाही को तुम्हें धोने नहीं देंगे

भले लोगो! ये सूरज रौशनी होने नहीं देंगे


तुम्हारे आँसुओं को सोख लेगी आग दहशत की

तुम्हें पत्थर बना देंगे, तुमें रोने नहीं देंगे


सुरंगें बिछ गईं रस्तों में, खेतों में, यहाँ अब तो

तुम्हें वो बीज भी आराम से बोने नहीं देंगे


घड़ी भर के लिए जो नींद मानो मोल भी ले ली

भयानक ख़्वाब तुमको चैन से सोने नहीं देंगे


जमीं हैं हर गली में ख़ून की देखो, कई परतें

मगर दंगे कभी इनको तुम्हें धोने नहीं देंगे


अभी ‘द्विज’ ! वक़्त है रुख़ आस्थाओं के बदलने का

यहाँ मासूम सपने वो तुम्हें बोने नहीं देंगे

Akhand
05-03-2011, 06:29 AM
अँधेरों पर भारी उजाले रहेंगे
तो हाथों में सबके निवाले रहेंगे

न महफ़ूज़ रह पाएगी अपनी अस्मत
जुबाँ पर हमारी जो ताले रहेंगे

ग़मों से भरी ज़िन्दगी जी रहे हैं
मगर भ्रम ख़ुशी का ही पाले रहेंगे

यूँ आँसू बहाने से कुछ भी न होगा
अगर दिल हैं काले तो काले रहेंगे

बढ़ाते रहोगे अगर हौसला तुम
तो पतवार हम भी सँभाले रहेंगे

Akhand
05-03-2011, 06:31 AM
अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की
तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की

कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में
मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की

वस्ल की रात न जाने क्यूँ इसरार था उनको जाने पर
वक़्त से पहले डूब गए तारों ने बड़ी दानाई की

उड़ते-उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया
रोते-रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की

Akhand
05-03-2011, 06:58 AM
अंगारों के तकिए रखकर
हम बारूदों के घर सोये

सन्नाटों के जल में हमने
बेचेनी के शब्द भिगोये

टी-हाऊस में शोर-शराबा
जंगल में सन्नाटा रोये

एक कैलेंडर खड़ा हुआ है
तारीख़ों का जंगल ढोये

हाथ में आए शंख-सीपियाँ
हमने दरिया खूब बिलोये

दिन का बालक सुबह-सवेरे
धूप के पानी से मुँह धोये

चौराहे पर खड़ा कबीरा
जग का मुजरा देखे, रोये

SUNIL1107
05-03-2011, 07:15 PM
अखंड जी इतनी दिलफरेब गजलें कहाँ से लाये मित्र ! धन्यबाद

Akhand
06-03-2011, 06:03 AM
अंगारों पर चलकर देखे
दीपशिखा-सा जलकर देखे

गिरना सहज सँभलना मुश्किल
कोई गिरे, सँभलकर देखे

दुनिया क्या, कैसी होती है
कुछ दिन भेस बदलकर देखे

जिसमें दम हो वह गाँधी-सा
सच्चाई में ढलकर देखे

कर्फ़्यू का मतलब क्या होता
बाहर जरा निकल कर देखे

Akhand
06-03-2011, 06:05 AM
अंजाम आज खुद़ से अनजान हो रहा है
आगाज़ ही अजल का सामान हो रहा है

कुछ और कह रही हैं लोहूलुहान राहें
कुछ और मंज़िलों से ऐलान हो रहा है

है चोर ही सिपाही मुंसिफ़ है खुद़ ही क़ातिल
किस शक्ल में नुमायाँ इंसान हो रहा है

जिनको मिली है ताक़त दुनिया सँवारने की
ख़ुदगर्ज आज उनका ईमान हो रहा है

देखा पराग तुमने दुनिया का रंग बोलो
इन हरक़तों से किसका नुक़सान हो रहा है।

Akhand
06-03-2011, 06:07 AM
अन्दाज़ा ही बहक न गया था निशाँ के पार
थी सैद की निगाह भी तीरो-कमाँ के पार!

आज़ादियाँ हैं खित्तए-बहम-ओ-गुमाँ के पार
आओ बसाएँ एक जहाँ इस जहाँ के पार!

ख़ामोशिए-दुआ हूँ, मुझे कुछ ख़बर नहीं
जाती हैं क्या सदाएँ तेरे आस्ताँ के पार!

सात आसमान झुक के उठाते हैं किसके नाज़?
किसकी झलक-सी है चमने-कहकशाँ के पार?

इतना उदास आपका दिल किसलिए हुआ?
हर दर्द की दवा है, ज़मानो मकाँ के पार!

क़ायम महाज़ अम्न के हिन्दोस्ताँ से हो!
फ़ौजें न जाएँ सरहदे-हिन्दोस्ताँ के पार!


शब्दार्थ :

सैद=शिकार; खित्तए-वहम-ओ-गुमाँ=वहम और गुमान का घेरा; चमने-कहकशाँ=आकाशगंगा का उपवन; अम्न के=शान्तिक्षेत्र

Akhand
06-03-2011, 06:09 AM
अंधकूपों सा अँधेरा रौशनाई हो गया है
राहज़न का राज़ लिखना ही बुराई हो गयाहै

कुछ लकीरों के फक़ीरों की यहाँ इतनी चली है
राह अपनी ख़ुद बनाना बेवफाई हो गया है

कामना की दौड़ में फिरसत किसे समझे ज़रा भी
यातना उस पेड़ की जो बोनसाई हो गया है

गलकटों चोंरों लुटेरों जाबिरों के कारनामों
का बदल कर नाम हाथों की सफाई हो गया है

इस हवा में साँस लेना था कहाँ आसान अब तो
फेफड़ों के ज़ोर की भी आजमाई हो गया है

कब करिंदों की सफाई का चले अभियान देखें
डॉन का तो काम सारा बासफाई हो गया है

प्रेम रस मुजरे दलाली हैं वही बस नाम केवल
देवदासी से बदलकर आजा बाई हो गया है

Akhand
06-03-2011, 06:14 AM
अंधेरी गली में मेरा घर रहा है
जहां तेल-बाती बिना इक दिया है.

जो रौशन मेरी आरजू का दिया है
मेरे साथ वो मेरी मां की दुआ है.

अजब है, उसी के तले है अंधेरा
दिया हर तरफ़ रौशनी बांटता है.

यहां मैं भी मेहमान हूं और तू भी
यहां तेरा क्या है, यहां मेरा क्या है.

खुली आंख में खाहिशों का समुंदर
न अंजाम जिनका कोई जानता है.

जहां देख पाई न अपनी ख़ुदी मैं
न जाने वहीं मेरा सर क्यों झुका है.

तुझे वो कहां ‘देवी’ बाहर मिलेगा
धड़कते हुए दिल के अंदर खुदा है.

Akhand
06-03-2011, 06:17 AM
अक़्ल उस नादाँ में क्या जो तेरा दीवाना नहीं
नूर१ पर तेरे मगस२ है वो जो परवाना नहीं

अपनी तौबा ज़ाहिदा जुज़ हर्फ़े-रिन्दाना नहीं३
ख़ुम४ हो यहाँ तो एहतियाजे-जामो-पैमाना५ नहीं

ख़ाले-ज़ेरे-ज़ुल्फ६ पर जी मत जला ऐ मुर्ग़े-दिल७
मान मेरा भी कहा ये दाम८ बे-दाना नहीं

अपने काबे की बुज़ुर्गी९ शैख़ जो चाहे सो कर
अज-रु-ए-तारीख़१० तो बेश-अज-सनमख़ाना११ नहीं

गर है गोशे-फ़ह्मे-आलम१२ वरना यूँ कहता है चुग़्द१३
थी न आबादी जहाँ ऐसा तो वीराना नहीं

बे-तजल्ली१४ तूर की किससे ये दिल गर्मी करे
जल बुझे हर शमा पर अपनी वो परवाना नहीं

हाय किस साक़ी ने पटका इस तरह मीना-ए-दिल१५
हो जहाँ रेज़ा१६ न उसका कोई मैख़ाना नहीं

सुनके नासिह का सुख़न१७ मजनूँ ने ‘सौदा’ यूँ कहा
ऐसे अहमक़ से मुख़ातिब हूँ मैं दीवाना नहीं

शब्दार्थ:
१.प्रकाश २.मक्खी ३.शराबी शब्द के सिवा कुछ और नहीं
४.शराब का घड़ा ५.जान और पैमाने की आवश्यकता
६.ज़ुल्फ़ के नीचे की त्वचा ७.दिल रूपी पक्षी ८.जाल
९.बड़ाई १०.इतिहास के आधार पर ११.बुतख़ाने से अधिक
(तात्पर्य यह है कि मुह्म्मद से पहले तक काबा भी एक
बुतख़ाना ही था) १२.दुनिया की समझ की बात सुनने वाला
कान १३.उल्लू १४.आलोक के बिना १५.दिल रूपी सुराही
१६.टुकड़ा १७.नसीहत करने वाले का वचन

Akhand
06-03-2011, 06:18 AM
अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ, बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाऊँ तो, मुझ को न समेटे कोई

काँप उठती हूँ मैं सोच कर तन्हाई में
मेरे चेहरे पर तेरा नाम न पढ़ ले कोई

जिस तरह ख़्वाब हो गए मेरे रेज़ा-रेज़ा
इस तरह से, कभी टूट कर, बिखरे कोई

अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं
अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई

कोई आहट, कोई आवाज़, कोई छाप नहीं
दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान है आए कोई

Akhand
06-03-2011, 06:20 AM
अगर आदमी ख़ुद से हारा न होता ,
ख़ुदा को किसी ने पुकारा न होता !

कहां आसमां पर ख़ुदा बैठ जाता ,
जो हम ने ज़मीं पर उतारा न होता !

बदलता नहीं वक़्त यह रंग अपने ,
किसी आदमी का गुज़ारा न होता !

नहीं ख़्वाब कोई हक़ीक़त में ढ़लता ,
जो दस्ते-जुनूं ने सँवारा न होता !

बुझानी अगर आग आसान होती ,
किसी राख में फिर अँगारा न होता !

कहीं पर भी होती अगर एक मंज़िल ,
तो गर्दिश में कोई सितारा न होता !

ये सारे का सारा जहां अपना होता ,
अगर यह हमारा तुम्हारा न होता !

Akhand
06-03-2011, 06:21 AM
अगर आप दिल से हमारे न होते
यों नज़रों से इतने इशारे न होते

नहीं प्यार होता जो उनको किसी से
तो आँचल में ये चाँद-तारे न होते

बहुत शोर था उनकी दरियादिली का
हमें देखकर यों किनारे न होते

कहाँ से ग़ज़ल प्यार की यह उतरती
जो हम उन निगाहों के मारे न होते

गुलाब! आप खिलते जो राहों में उनकी
तो ऐसे कभी बेसहारे न होते

Akhand
06-03-2011, 06:23 AM
अगर आप होते भुलाने के क़ाबिल ,
तो होते कहां दिल लगाने के क़ाबिल !

वो वादा तुम्हारा , भरोसा हमारा ,
लगे कब हमें टूट जाने के क़ाबिल !

बसी है जो आंखों में तस्वीर तेरी ,
नहीं आंसुयों से मिटाने के क़ाबिल !

अँधेरे जुदाई के कुछ कम तो होते ,
जो होते तेरे ख़त जलाने के क़ाबिल !

मुहब्बत की शायद हक़ीक़त यही है ,
कि शै है ये सपने सजाने के क़ाबिल !

सनम मुझ को मंज़ूर मरना ख़ुशी से ,
बने मौत लेकिन फ़साने के क़ाबिल !

Akhand
06-03-2011, 06:25 AM
अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

Akhand
06-03-2011, 06:26 AM
अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए

तेरी सहर हो मेरा आफ़ताब हो जाए


हुज़ूर! आरिज़ो-ओ-रुख़सार क्या तमाम बदन

मेरी सुनो तो मुजस्सिम गुलाब हो जाए


उठा के फेंक दो खिड़की से साग़र-ओ-मीना

ये तिशनगी जो तुम्हें दस्तयाब हो जाए


वो बात कितनी भली है जो आप करते हैं

सुनो तो सीने की धड़कन रबाब हो जाए


बहुत क़रीब न आओ यक़ीं नहीं होगा

ये आरज़ू भी अगर कामयाब हो जाए


ग़लत कहूँ तो मेरी आक़बत बिगड़ती है

जो सच कहूँ तो ख़ुदी बेनक़ाब हो जाए.

Akhand
08-03-2011, 07:42 AM
अपनी दीवानगी को गंवाना फ़िज़ूल ,
जुगनुओं रोशनी में नहाना फिजूल ।

किस्त में खुदकुशी इश्क का है चलन ,
इश्क दरिया है पर डूब जाना फ़िज़ूल ।

चांदनी रात में चांद के सामने यूँ -
आपका इसकदर रूठ जाना फ़िज़ूल ।

शर्त है प्यार में प्यार की बात हो ,
प्यार को बेवजह आजमाना फ़िज़ूल ।

लफ्ज़ को बिन तटोले हुये ये'प्रभात'
बज़्म में कोई भी गीत गाना फ़िज़ूल ।

Akhand
08-03-2011, 07:43 AM
जब गजल के हम कदम महफ़िल चली अच्छा लगा
शेर पर मेरे जो तुमने वाह की अच्छा लगा

यों तो कहते हैं यहाँ पर कुछ न कुछ हम तुम सभी
बात मेरी थी तुम्हें अपनी लगी अच्छा लगा

सौ तरह की बंदिशों के बीच जो मैंने कहा
तेरीनाज़रों नें मेरी ताईद की अच्छा लगा

शायरी में लाजमी है एक हद तक पेचों ख़म
फिर भी मेरी बात संप्रेषित हुई अच्छा लगा

अपनी बातें आप तक पहुचा सकूँ ये फ़िक्र थी
इस लिए जब शेर पर ताली बजी अच्छा लगा

शायरी के पारखी की फ़िक्र अब किसको हो क्यों
तुमने मेरे शेर पर जो दाद दी अच्छा लगा

Akhand
08-03-2011, 07:47 AM
अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का
याद आता है हमें हाय! ज़माना दिल का

तुम भी मुँह चूम लो बेसाख़ता प्यार आ जाए
मैं सुनाऊँ जो कभी दिल से फ़साना दिल का

पूरी मेंहदी भी लगानी नहीं आती अब तक
क्योंकर आया तुझे ग़ैरों से लगाना दिल का

इन हसीनों का लड़कपन ही रहे या अल्लाह
होश आता है तो आता है सताना दिल का

मेरी आग़ोश से क्या ही वो तड़प कर निकले
उनका जाना था इलाही के ये जाना दिल का

दे ख़ुदा और जगह सीना-ओ-पहलू के सिवा
के बुरे वक़्त में होजाए ठिकाना दिल का

उंगलियाँ तार-ए-गरीबाँ में उलझ जाती हैं
सख़्त दुश्वार है हाथों से दबाना दिल का

बेदिली का जो कहा हाल तो फ़रमाते हैं
कर लिया तूने कहीं और ठिकाना दिल का

छोड़ कर उसको तेरी बज़्म से क्योंकर जाऊँ
एक जनाज़े का उठाना है उठाना दिल का

निगहा-ए-यार ने की ख़ाना ख़राबी ऎसी
न ठिकाना है जिगर का न ठिकाना दिल का

बाद मुद्दत के ये ऎ दाग़ समझ में आया
वही दाना है कहा जिसने न माना दिल का

Akhand
08-03-2011, 07:48 AM
अपनी धुन में रहता हूँ, मैं भी तेरे जैसा हूँ

ओ पिछली रुत के साथी, अब के बरस मैं तन्हा हूँ

तेरी गली में सारा दिन, दुख के कंकर चुनता हूँ

मुझ से आँख मिलाये कौन, मैं तेरा आईना हूँ

मेरा दिया जलाये कौन, मैं तेरा ख़ाली कमरा हूँ

तू जीवन की भरी गली, मैं जंगल का रस्ता हूँ

अपनी लहर है अपना रोग, दरिया हूँ और प्यासा हूँ

आती रुत मुझे रोयेगी, जाती रुत का झोंका हूँ

Akhand
08-03-2011, 07:49 AM
अच्छी है यही खुद्दारी क्या
रख जेब में दुनियादारी क्या

जो दर्द छुपा के हंस दे हम
अश्क़ों से हुई गद्दारी क्या

हंस के जो मिलो सोचे दुनिया
मतलब है, छुपाया भारी क्या

वे देह के भूखे, क्या जाने
ये प्यार वफ़ा दिलदारी क्या

बातें तो कहे सच्ची "श्रद्धा"
वे सोचे, मीठी ख़ारी क्या

Akhand
08-03-2011, 07:50 AM
अपनी नज़र से आज गिरा दीजिए मुझे
मेरी वफ़ा की कुछ तो सज़ा दीजिए मुझे

यक-तरफ़ा फ़ैसले में था इंसाफ़ कहाँ का
मेरा क़ुसूर क्या था बता दीजिए मुझे

दो जिस्म एक जान है बीमार हैं दोनों
उसको शफ़ा मिलेगी दुआ दीजिए मुझे

मैं जा रहा हूँ आऊँगा शायद ही लौट कर
ऐसे न बार-बार सदा दीजिए मुझे

इस दौर में अब इब्ने-मरयम नहीं मिलते
बस कान में अंजील सुना दीजिए मुझे

रोते हुए बच्चे ने माँ-बाप से कहा
बस चाँद आसमान से ला दीजिए मुझे

सोया रहा हूँ चाँद मैं ग़फ़लत की नींद में
रुख़सत का आया वक्त जगा दीजिए मुझे

BHARAT KUMAR
13-03-2011, 05:27 AM
मित्र बहुत ही उम्दा शेर हैं.. खास बात ये की मुस्किल शब्दों के लिए अर्थ भी दिए गए हैं.. बहुत धन्यवाद मित्र,,,

Akhand
16-03-2011, 07:02 AM
आपके इस शहर में गुज़ारा नहीं
अजनबी को कहीं पर सहारा नहीं

बह गया मैं अगर, तो बुरा क्या हुआ ?
खींच लेती किसे तेज़ धारा नहीं

आरज़ू में जनम भर खड़ा मैं रहा
आपने ही कभी तो पुकारा नहीं

हाथ मैंने बढ़ाया किया बारहा
आपको साथ मेरा गवारा नहीं

मौन भाषा हृदय की उन्हें क्यों छुए ?
जो समझते नयन का इशारा नहीं

मैं भटकता रहा रौशनी के लिए
गगन में कहीं एक तारा नहीं

लौटने का नहीं अब कभी नाम लो
सामने है शिखर और चारा नहीं

बस, लहर ही लहर एक पर एक है
सिंधु ही है, कहीं भी किनारा नहीं

ग़ज़ल की फसल यह इसी खेत की
किसी और का घर सँवारा नहीं

Akhand
16-03-2011, 07:04 AM
अजनबी ख़ौफ़ फ़िज़ाओं में बसा हो जैसे,
शहर का शहर ही आसेबज़दा हो जैसे,

रात के पिछले पहर आती हैं आवाज़ें-सी,
दूर सहरा में कोई चीख़ रहा हो जैसे,

दर-ओ-दीवार पे छाई है उदासी ऐसी
आज हर घर से जनाज़ा-सा उठा हो जैसे

मुस्कुराता हूँ पा-ए-ख़ातिर-ए-अहबाब- मगर
दुःख तो चेहरे की लकीरों पे सजा हो जैसे

अब अगर डूब गया भी तो मरूँगा न 'कमाल'
बहते पानी पे मेरा नाम लिखा हो जैसे

Akhand
16-03-2011, 07:06 AM
अपनी नज़र से कोई मुझे जगमगा गया
महफ़िल में आज सब की निगाहों में छा गया

कल तक तो इस हुजूम में मेरा कोई न था
लो आज हर कोई मुझे अपना बना गया

आता नहीं था कोई परिन्दा भी आस-पास
अब चाँद ख़ुद उतर के मेरी छत पे आ गया

जो दर्द मेरी जान पे रहता था रात-दिन
वो दर्द मेरी ज़िन्दगी के काम आ गया

हैरान हो के लोग मुझे पूछते हैं आज
‘आज़ाद’ तुमको कौन ये जीना सिखा गया

Akhand
16-03-2011, 07:20 AM
अपनी पलकें वो बंद रखता है
जाने कैसी पसंद रखता है

ख़ुद को कहता है आसमाँ पैमा
कितनी ओछी कमंद रखता है

मारा जाएगा देखना इक दिन
क्यूँ दिल ए दर्दमंद रखता है

साथ वाले ख़फा ख़ता ये है
क्यूँ इरादे बुलंद रखता है

धूप से सामना न हो जाए
घर से दरवाज़े बंद रखता है

Akhand
16-03-2011, 07:30 AM
अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ
ऐसे जिद्दी हैं परिंदे के उड़ा भी न सकूँ

फूँक डालूँगा किसी रोज ये दिल की दुनिया
ये तेरा खत तो नहीं है कि जला भी न सकूँ

मेरी गैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे
उसने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ

इक न इक रोज कहीं ढ़ूँढ़ ही लूँगा तुझको
ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ

फल तो सब मेरे दरख्तों के पके हैं लेकिन
इतनी कमजोर हैं शाखें कि हिला भी न सकूँ

Akhand
16-03-2011, 07:33 AM
अजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है
कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है

जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई,
नींद में जैसे कोई लौट-लौट जाता है

होश अपने का भी रहता नहीं मुझे जिस वक्त
द्वार मेरा कोई उस वक्त खटखटाता है

शोर उठता है कहीं दूर क़ाफिलों का-सा
कोई सहमी हुई आवाज़ में बुलाता है

देखिए तो वही बहकी हुई हवाएँ हैं,
फिर वही रात है, फिर-फिर वही सन्नाटा है

हम कहीं और चले जाते हैं अपनी धुन में
रास्ता है कि कहीं और चला जाता है

दिल को नासेह की ज़रूरत है न चारागर की
आप ही रोता है औ आप ही समझाता है ।

Akhand
16-03-2011, 07:36 AM
अपनी फ़ितरत वो कब बदलता है
साँप जो आस्तीं में पलता है

दिल में अरमान जो मचलता है
शेर बन कर ग़ज़ल में ढलता है

मुझको अपने वजूद का एहसास
इक छ्लावा-सा बन के छलता है

जब जुनूँ हद से गुज़र जाये तो
आगही का चराग़ जलता है

उसको मत रहनुमा समझ लेना
दो क़दम ही जो साथ चलता है

वो है मौजूद मेरी नस-नस में
जैसे सीने में दर्द पलता है

रिन्द ‘साग़र’! उसे नहीं कहते
पी के थोड़ी-सी जो उछलता है.

Akhand
16-03-2011, 07:37 AM
अजनबी शहर के अजनबी रास्ते , मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे
में बुहत देर तक यूँही चलता रह, तुम बहुत देर तक याद आते रहे।.

ज़हर मिलता रह ज़हर पीते रहे , रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे,
ज़िंदगी भी हमे आजमाती रही , और हम भी उसे आजमाते रहे।

ज़ख्म जब भी कोई जहन[1]-ओ-दिल पे लगा , ज़िंदगी की तरफ एक दरीचा[2] खुला,
हम भी गोया किसी साज़ के तार हैं , चोट खाते रहे गुन-गुनाते रहे।

कल कुछ ऐसा हुआ में बहोत तक गया, इस लिए सुने के भी अनसुनी कर गया,
कितनी यादों के भटके हुआ कारवाँ , दिल के ज़ख्मों के दर खट-खटते रहे।


शब्दार्थ:

↑ दिमाग
↑ खिड़की

Akhand
31-03-2011, 06:29 AM
वो यक़ीनन दर्द अपना पी गया
जो परिन्दा प्यासा रहके जी गया

झाँकता था जब बदन मिलती थी भीख
क्यूँ मेरा दामन कोई कर सी गया

जाने कितने पेट भर जाते मगर
बच गया खाना वो सब बासी गया

उसमें गहराई समंदर की कहाँ
जो मुझे दरिया समझकर पी गया

भौंकने वाले सभी चुप हो गए
जब मोहल्ले से मेरे हाथी गया

चहचहाकर सारे पंछी उड़ गए
वार जब सैयाद का खाली गया

लौटकर बस्ती में फिर आया नहीं
बनके लीडर जब से वो दिल्ली गया

Akhand
31-03-2011, 06:40 AM
वतन वालो, ये मसनूई' गिरानी देखते जाओ------नक़ली, बनावटी
के सस्ता है लहू', महँगा है पानी देखते जाओ

जिन्हें रोटी नहीं मिलती वो दस बच्चों के वालिद' हैं---- पिता
ये इफ़लास' और ये जोश-ए-जवानी' देखते जाओ------ग़रीबी, जवानी का जोश

जो पहले फ़स्ल' उगाते थे अब बच्चे उगाते हैं------ फसल
नए टाइप की ये खेती-किसानी देखते जाओ

हर इक वालिद यहाँ मिस्ले-मुसव्विर' हमसे कहता है-----चित्रकार के समान
के बादे नक़्शे-अव्वल', नक़्शे-सानी' देखते जाओ------पहले चित्र के बाद दूसरा चित्र

ग़रीबों के लिए उसरत', अमीरों के लिए इशरत------परेशानी
मगर मारे गए हम दरमियानी देखते जाओ

'फ़िगार' इस दौर में भी तंज़िया अशआर' कहता है-----व्यंग्य के शे'र
तुम इस शायर की आशिफ़्ता बयानी' देखते जाओ -----बकवास

Akhand
31-03-2011, 06:41 AM
इक दवात' एक क़लम' हो तो ग़ज़ल होती है-------इंकपोट---पेन
जब ये सामान बहम' हो तो ग़ज़ल होती है---------एक जगह

मुफ़लिसी' इश्क़, मरज़' भूक, बुढ़ापा, औलाद-----ग़रीबी,---बीमारी
दिल को हर क़िस्म का ग़म हो तो ग़ज़ल होती है

भूत आसेब 'शयातीन' अजम्बह' हमज़ाद'----बुरी आत्मा,--शैतान,--अंजाने, अपने
इन बुज़ुर्गों का करम हो तो ग़ज़ल होती है

शे'र नाज़िल' नहीं होता कभी लालच के बग़ैर----अवतरित होना
दिल को उम्मीदे-रक़म' हो तो ग़ज़ल होती है----रुपया प्राप्त होने की उम्मीद

तन्दरुस्ती भी ज़रूरी है तग़ज़्ज़ुल' के लिए----अच्छी ग़ज़ल
हाथ और पाँव में दम हो तो ग़ज़ल होती है

पूँछ कुत्ते की जो टेढ़ी हो तो कुछ भी न बने
और तेरी ज़ुल्फ़ में ख़म' हो तो ग़ज़ल होती है------ बालों में बल

सिर्फ़ ठर्रे' से तो क़तआत' ही मुमकिन हैं 'फ़िराक़'----दारू
हाँ, अगर व्हिस्कि-ओ-रम हो तो ग़ज़ल होती है

Akhand
06-04-2011, 07:49 AM
आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया
मैंने दिये को आँधी की मर्ज़ी पे रख दिया

आओ तुम्हें दिखाते हैं अंजामे-ज़िंदगी
सिक्का ये कह के रेल की पटरी पे रख दिया

फिर भी न दूर हो सकी आँखों से बेवगी
मेंहदी ने सारा ख़ून हथेली पे रख दिया

दुनिया क्या ख़बर इसे कहते हैं शायरी
मैंने शकर के दाने को चींटी पे रख दिया

अंदर की टूट -फूट छिपाने के वास्ते
जलते हुए चराग़ को खिड़की पे रख दिया

घर की ज़रूरतों के लिए अपनी उम्र को
बच्चे ने कारख़ाने की चिमनी पे रख दिया

पिछला निशान जलने का मौजूद था तो फिर
क्यों हमने हाथ जलते अँगीठी पे रख दिया

Akhand
06-04-2011, 07:52 AM
इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये
आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिये

आप दरिया हैं तो फिर इस वक्त हम खतरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हमको पार होना चाहिये

ऐरे गैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों
आपको औरत नहीं अखबार होना चाहिये

जिंदगी कब तलक दर दर फिरायेगी हमें
टूटा फूटा ही सही घर बार होना चाहिये

अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दें मुझे
इश्क के हिस्से में भी इतवार होना चाहिये

SHASWAT_BHARDWAJ
26-04-2011, 10:41 PM
ज़िन्दगी एक सुलगती सी चिता है साहिर |
शोला बनती है , ना ये बुझ के ,धुंआ होती है !

vasu12345
30-04-2011, 06:29 PM
kya baat hai

Akhand
02-05-2011, 06:34 AM
अक़ायद वहम है मज़हब ख़याल-ए-ख़ाम है साक़ी
अज़ल से ज़हन-ए-इन्सां बस्त-ए-औहाम है साक़ी

हक़ीक़त-आशनाई अस्ल में गुम-कदर्ह-राही है
उरूस-ए-आगही परवरदह-ए-अबहाम है साक़ी

मुबारक हो जाईफ़ी को ख़िरद की फ़लसफ़ादानी
जवानी बेनियाज़-ए-इब्रत-ए-अन्जाम है साक़ी

अभी तक रास्ते के पेच-ओ-ख़म से दिल धड़कता है
मेरा ज़ौक़-ए-तलब शायद अभी तक ख़ाम है साक़ी

वहाँ भेजा गया हूँ चाक करने पर्दे-ए-शब को
जहाँ हर सुबह के दामन पे अक्स-ए-शाम है साक़ी

Akhand
02-05-2011, 06:37 AM
अपने माज़ी[1] के तसव्वुर से हिरासा[2] हूँ मैं
अपने गुज़रे हुए अय्यम[3] से नफ़रत है मुझे
अपनी बेकार तमन्नओं पे शर्मिंदा हूँ मैं
अपनी बेसुध[4] उम्मीदों पे निदामत है मुझे

मेरे माज़ी को अंधेरे में दबा रहने दो
मेरा माज़ी मेरी ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं
मेरी उम्मीदों का हासिल मेरी काचाह[5] का सिला
एक बेनाम अज़ीयत[6] के सिवा कुछ भी नहीं
कितनी बेकार उम्मीदों का सहारा लेकर
मैंने ऐवान[7] सजाये थे किसी की ख़ातिर
कितनी बेरब्त[8] तमन्नाओं के माभम[9] ख़ाके[10]
अपने ख़्वाबों मे बसाये थे किसी की ख़ातिर
मुझसे अब मेरी मोहब्बत के फ़साने न पूछो
मुझको कहने दो के मैंने उन्हें चाहा ही नहीं
और वो मस्त निगाहें जो मुझे भूल गई
मैंने उन मस्त निगाहों को सराहा ही नहीं
मुझको कहने दो कि मैं आज भी जी सकता हूँ
इश्क़ नाकाम सही ज़िन्दगी नाकाम नहीं
उनको अपनाने की ख़्वाहिश उन्हें पाने की तलब
शौक़ बेकार सही सै-ग़म[11] अंजाम नहीं
वही गेसू वही नज़र वही आरिद[12] वही जिस्म
मैं जो चाहूँ कि मुझे और भी मिल सकते हैं
वो कँवल जिनको कभी मुनके लिये खिलना था
उनकी नज़रों से बहुत दूर भी खिल सकते हैं
शब्दार्थ:

↑ बीता हुआ
↑ परेशान
↑ दिन
↑ बेहोश/बेखबर
↑ खोज
↑ दुख
↑ महल
↑ अधूरी
↑ छुपे हुए
↑ ढांचे
↑ कहने के लिए
↑ होंठ

Akhand
02-05-2011, 06:38 AM
अब आए या न आए इधर पूछते चलो
क्या चाहती है उनकी नज़र पूछते चलो

हम से अगर है तर्क-ए-ताल्लुक़ तो क्या हुआ
यारो ! कोई तो उनकी ख़बर पूछते चलो

जो ख़ुद को कह रहे हैं कि मंज़िल शनास हैं
उनको भी क्या ख़बर है मगर पूछते चलो

किस मंज़िल-ए-मुराद की जानिब रवाँ हैं हम
ऐ रहरवान-ए-ख़ाक बसर पूछते चलो

Sheena
02-05-2011, 07:26 AM
अति सुन्दर , बहुत अच्छा सूत्र है रेपो स्वीकार करें

philogynist
02-05-2011, 11:04 AM
हम भी बाज़ार में थे वो भी बाज़ार में थी ,
हम पर भी फूल बरस रहे थे उन पर भी फूल बरस रहे थे ,
लेकिन फर्क इतना था के वो डोली में थी और हम जनाज़े में थे

Akhand
04-05-2011, 06:24 AM
अँधेरी रात में आँखों पे पट्टी बन ही जाता है
अधूरा ख्वाब दिन चढ़ने पे मिट्टी बन ही जाता है

ज़रूरत से ज़ियादा राबता अच्छा नहीं होता
वो रिश्ता फिर घिसी साबुन की बट्टी बन ही जाता है

ज़रूरी क्या उसी पर चुटकुले हरदम गढ़े जायें
कभी सरदार भी जसपाल भट्टी बन ही जाता है

उन्हें इन्सानियत को प्यार करना कौन सिखलाये
कोई मज़हब नयी नस्लों की घुट्टी बन ही जाता है

चलो ये शुक्र है मंगल में बीतीं चार घड़ियां भी
कोई इतवार फिर जीवन की छुट्टी बन ही जाता है

ज़ियादा चाशनी में एक दिन कीड़े भी पड़ते हैं
जो जिगरी यार था वो याद खट्टी बन ही जाता है

पितामह भीष्म से इक जन्म का बदला चुकाने को
शिखण्डी आखिरश अर्जुन की टट्टी* बन ही जाता है

BHARAT KUMAR
04-05-2011, 06:32 AM
ये मसला ही ऐसा था, के हल न कर सका!
ए जिंदगी, मैं तुझे मुकम्मल न कर सका!

BHARAT KUMAR
04-05-2011, 06:33 AM
हादसे क्या-क्या तुम्हारी बेरुखी से हो गये!
सारी दुनिया के लिए हम अजनबी से हो गये!
कुछ तुम्हारे गेसुवों की बेरहमी ने कर दिए;
कुछ अँधेरे मेरे घर में रौशनी से हो गए!!

BHARAT KUMAR
04-05-2011, 06:36 AM
मेरा जाके कासिद सलाम उनको कहना,
और कह देना के सलाम आखरी है!
मुलाक़ात हमसे न अब हो सकेगी;
ये बीमार-ए-दिल का पयाम आखरी है!!

BHARAT KUMAR
04-05-2011, 06:38 AM
कासिद उनका आता है,यही पैगाम ले-लेकर!
के तनहा रोते हैं अक्सर, वो तेरा नाम ले-लेकर!!

BHARAT KUMAR
04-05-2011, 06:39 AM
कासिद उनका आता है,यही पैगाम ले-लेकर!
के तनहा रोते हैं अक्सर, वो तेरा नाम ले-लेकर!!



न आई मौत ही हमको,ना वोही लोट के आया!
जिए जाते हैंहम जिस बेवफा का नाम ले-लेकर

Akhand
04-05-2011, 06:48 AM
अजीब शख़्स हूँ मैं उसको चाहने वाला
जो आदतन ही दिलों को है तोड़्ने वाला

मैं पी रहा हूँ बड़े ज़र्फ़ से उसी दिन से
कि जब से कोई नहीं मुझको रोकने वाला

बहुत उदास हुआ मेरी चुप्पियों से वही
हर एक बात पे रह-रह के टोकने वाला

मैं उड़ गया तो मेरे लौटने को तरसेगा
मेरे परों को सुबह शाम तोलने वाला

वो लाख मुझसे कहें, मिन्नतें करें लेकिन
मैं अब के भेद नहीं कोई खोलने वाला

मेरे सिवाए कोई और हो नहीं सकता
मेरे वजूद को मिट्टी में रोलने वाला

मैं आइने की तरह क्यूँ फ़िज़ूल में टूटूँ
कुछ इस अदा से मैं अब सच हूँ बोलने वाला

Sheena
04-05-2011, 06:49 AM
अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ, बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाऊँ तो, मुझ को न समेटे कोई

काँप उठती हूँ मैं सोच कर तन्हाई में
मेरे चेहरे पर तेरा नाम न पढ़ ले कोई

जिस तरह ख़्वाब हो गए मेरे रेज़ा-रेज़ा
इस तरह से, कभी टूट कर, बिखरे कोई

अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं
अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई

कोई आहट, कोई आवाज़, कोई छाप नहीं
दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान है आए कोई

Akhand
04-05-2011, 06:53 AM
अख़बारों में असर नहीं* है
कोई अच्छी ख़बर नहीं है

शहर जुर्म का या मुजरिम का
‘भद्रलोक’ की गुज़र नहीं है

दुराचार की कथा-व्यथा से
एक अछूता नगर नहीं है

मंज़िल मिल पाए भी कैसे
सही दिशा में सफ़र नही* है

आज आदमी ज़हरीला है
अब साँपों में ज़हर नहीं है

पर दुर्दिन भी मिट जाएँगे
कोई भी तो अमर नहीं है

Akhand
05-05-2011, 06:24 AM
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे

घर सजाने का तस्सवुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे

क़हक़हा आँख का बरताव बदल देता है
हँसनेवाले तुझे आँसू नज़र आयें कैसे

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा
एक क़तरे को समुन्दर नज़र आयें कैसे

Akhand
05-05-2011, 06:25 AM
अपने हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा भी नहीं
मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा

मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

सारी दुनिया की नज़र में है मेरी अह्द—ए—वफ़ा
इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा?

Akhand
05-05-2011, 06:27 AM
आते-आते मेरा नाम सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया

वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मैं था कि सच बोलता रह गया

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता रह गया

Akhand
05-05-2011, 06:31 AM
उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटे
सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक आँखों में त'अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Akhand
05-05-2011, 06:39 AM
कहाँ तक आँख रोएगी कहाँ तक किसका ग़म होगा
मेरे जैसा यहाँ कोई न कोई रोज़ कम होगा

तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना रो चुका हूँ मैं
कि तू मिल भी अगर जाये तो अब मिलने का ग़म होगा

समन्दर की ग़लतफ़हमी से कोई पूछ तो लेता ,
ज़मीं का हौसला क्या ऐसे तूफ़ानों से कम होगा

मोहब्बत नापने का कोई पैमाना नहीं होता ,
कहीं तू बढ़ भी सकता है, कहीं तू मुझ से कम होगा

Sheena
05-05-2011, 06:44 AM
उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटे
सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक आँखों में त'अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है





बहुत सुन्दर मित्र आप का कलेक्शन बहुत अच्छा है मज़ा आ रहा है

Akhand
05-05-2011, 06:45 AM
कही-सुनी पे बहुत एतबार करने लगे
मेरे ही लोग मुझे संगसार करने लगे

पुराने लोगों के दिल भी हैं ख़ुशबुओं की तरह
ज़रा किसी से मिले, एतबार करने लगे

नए ज़माने से आँखें नहीं मिला पाये
तो लोग गुज़रे ज़माने से प्यार करने लगे

कोई इशारा, दिलासा न कोई वादा मगर
जब आई शाम तेरा इंतज़ार करने लगे

हमारी सादामिजाज़ी की दाद दे कि तुझे
बगैर परखे तेरा एतबार करने लगे.

Akhand
05-05-2011, 06:48 AM
कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती है
ये सलीक़ा हो, तो हर बात सुनी जाती है

जैसा चाहा था तुझे, देख न पाये दुनिया
दिल में बस एक ये हसरत ही रही जाती है

एक बिगड़ी हुई औलाद भला क्या जाने
कैसे माँ-बाप के होंठों से हँसी जाती है

कर्ज़ का बोझ उठाये हुए चलने का अज़ाब
जैसे सर पर कोई दीवार गिरी जाती है

अपनी पहचान मिटा देना हो जैसे सब कुछ
जो नदी है वो समंदर से मिली जाती है

पूछना है तो ग़ज़ल वालों से पूछो जाकर
कैसे हर बात सलीक़े से कही जाती है

Akhand
05-05-2011, 06:49 AM
क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता
आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता

तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसमें तेरी क्या
हर शख्स मेरा साथ, निभा भी नहीं सकता

प्यासे रहे जाते हैं जमाने के सवालात
किसके लिए जिन्दा हूँ, बता भी नहीं सकता

घर ढूंढ रहे हैं मेरा , रातों के पुजारी
मैं हूँ कि चरागों को बुझा भी नहीं सकता

वैसे तो एक आँसू ही बहा के मुझे ले जाए
ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता.

Akhand
05-05-2011, 06:50 AM
क्या बताऊं कैसे ख़ुद को दर-ब-दर मैंने किया,
उम्र भर किस-किस के हिस्से का सफ़र मैंने किया ।

तू तो नफ़रत भी न कर पाएगा इतनी शिद्दत1 के साथ,
जिस बला का प्यार तुझसे बे-ख़बर मैंने किया ।

कैसे बच्चों को बताऊं रास्तों के पेचो-ख़म2,
ज़िन्दगी भर तो किताबों का सफ़र मैंने किया ।

शोहरतों की नज़्र3 कर दी शेर की मासूमियत,
इस दिये की रोशनी को दर-ब-दर मैंने किया ।

चंद जज़्बातों से रिश्तों के बचाने को ‘वसीम‘,
कैसा-कैसा जब्र4 अपने आप पर मैंने किया ।


1. शिद्दत: अति, 2. पेचो-ख़म: घुमाव- फिराव, 3. नज़्र: भेंट, उपहार, 4. जब्र: ज़ोर-ज़बर्दस्ती

Akhand
05-05-2011, 06:51 AM
खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहीं
और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं

वो समझता था, उसे पाकर ही मैं रह जाऊंगा
उसको मेरी प्यास की शिद्दत का अन्दाज़ा नहीं

जा, दिखा दुनिया को, मुझको क्या दिखाता है ग़रूर
तू समन्दर है, तो हो, मैं तो मगर प्यासा नहीं

कोई भी दस्तक करे, आहट हो या आवाज़ दे
मेरे हाथों में मेरा घर तो है, दरवाज़ा नहीं

अपनों को अपना कहा, चाहे किसी दर्जे के हों
और अब ऐसा किया मैंने, तो शरमाया नहीं

उसकी महफ़िल में उन्हीं की रौशनी, जिनके चराग़
मैं भी कुछ होता, तो मेरा भी दिया होता नहीं

तुझसे क्या बिछड़ा, मेरी सारी हक़ीक़त खुल गयी
अब कोई मौसम मिले, तो मुझसे शरमाता नहीं

Farhan
05-05-2011, 06:52 AM
वाह अखंड जी बहुत ही अच्छा सूत्र है आपने किसी की याद दिला दी।

Akhand
06-05-2011, 06:51 AM
ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है
समन्दरों ही के लहजे में बात करता है

ख़ुली छतों के दिये कब के बुझ गये होते
कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है

शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं
किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है

ज़मीं की कैसी विक़ालत हो फिर नहीं चलती
जब आस्मान से कोई फ़ैसला उतरता है

तुम आ गये हो तो फिर कुछ चाँदनी सी बातें हों
ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है

Akhand
06-05-2011, 06:53 AM
तुझको सोचा तो पता हो गया रुसवाई को
मैंने महफूज़ समझ रखा था तन्हाई को

जिस्म की चाह लकीरों से अदा करता है
ख़ाक समझेगा मुसव्विर तेरी अँगडाई को

अपनी दरियाई पे इतरा न बहुत ऐ दरिया ,
एक कतरा ही बहुत है तेरी रुसवाई को

चाहे जितना भी बिगड़ जाए ज़माने का चलन,
झूठ से हारते देखा नहीं सच्चाई को

साथ मौजों के सभी हो जहाँ बहने वाले ,
कौन समझेगा समन्दर तेरी गहराई को.

Akhand
06-05-2011, 06:54 AM
मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो
के मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो

वो बेख़याल मुसाफ़िर मैं रास्ता यारो
कहाँ था बस में मेरे उस को रोकना यारो

मेरे क़लम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी
के अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारो

तमाम शहर ही जिस की तलाश में गुम था
मैं उस के घर का पता किस से पूछता यारो

Akhand
06-05-2011, 06:56 AM
मैं अपने ख़्वाब से बिछ्ड़ा नज़र नहीं आता
तू इस सदी में अकेला नज़र नहीं आता

अजब दबाव है इन बाहरी हवाओं का
घरों का बोझ भी उठता नज़र नहीं आता

मैं इक सदा पे हमेशा को घर छोड़ आया
मगर पुकारने वाला नज़र नहीं आता

मैं तेरी राह से हटने को हट गया लेकिन
मुझे तो कोई भी रस्ता नज़र नहीं आता

धुआँ भरा है यहाँ तो सभी की आँखों में
किसी को घर मेरा जलता नज़र नहीं आता.

Akhand
06-05-2011, 06:58 AM
मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा

हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उस से रिश्ता वसीम
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा

Akhand
06-05-2011, 07:00 AM
मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले

किताब-ए-माज़ी[1] के औराक़[2] उलट के देख ज़रा
न जाने कौन-सा सफ़्हा[3] मुड़ा हुआ निकले

जो देखने में बहुत ही क़रीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फ़ासिला निकले

शब्दार्थ:

↑ अतीत की पुस्तक
↑ पन्ने
↑ पन्ना

Akhand
06-05-2011, 07:08 AM
रात के टुकड़ों पे पलना छोड़ दे
शम्अ से कहना के जलना छोड़ दे

मुश्किलें तो हर सफ़र का हुस्न हैं,
कैसे कोई राह चलना छोड़ दे

तुझसे उम्मीदे- वफ़ा बेकार है,
कैसे इक मौसम बदलना छोड़ दे

मैं तो ये हिम्मत दिखा पाया नहीं,
तू ही मेरे साथ चलना छोड़ दे

कुछ तो कर आदाबे-महफ़िल का लिहाज़,
यार ! ये पहलू बदलना छोड़ दे.

Akhand
06-05-2011, 07:11 AM
लहू न हो तो क़लम तरजुमाँ नहीं होता
हमारे दौर में आँसू ज़ुबाँ नहीं होता

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

ये किस मक़ाम पे लाई है मेरी तनहाई
के मुझ से आज कोई बदगुमाँ नहीं होता

मैं उस को भूल गया हूँ ये कौन मानेगा
किसी चराग़ के बस में धुआँ नहीं होता

'वसीम' सदियों की आँखों से देखिये मुझ को
वो लफ़्ज़ हूँ जो कभी दास्ताँ नहीं होता

Sheena
11-06-2011, 07:22 AM
मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क तुम्हें हो जायेगा
दीवारों से सर टकराओगे जब इश्क तुम्हें हो जायेगा

हर बात गवारा कर लोगे मन्नत भी उतारा कर लोगे
ताबीज़ें भी बंधवाओगे जब इश्क तुम्हें हो जायेगा

तन्हाई के झूले खूलेंगे हर बात पुरानी भूलेंगे
आईने से तुम घबराओगे जब इश्क तुम्हें हो जायेगा

जब सूरज भी खो जायेगा और चाँद कहीं सो जायेगा
तुम भी घर देर से आओगे जब इश्क तुम्हें हो जायेगा

बेचैनी बढ़ जायेगी और याद किसी की आएगी
तुम मेरी गज़लें गाओगे जब इश्क तुम्हें हो जायेगा

Sheena
11-06-2011, 07:25 AM
देख, दहलीज़ से काई नहीं जाने वाली

ये ख़तरनाक सचाई नहीं जाने वाली


कितना अच्छा है कि साँसों की हवा लगती है

आग अब उनसे बुझाई नहीं जाने वाली


एक तालाब—सी भर जाती है हर बारिश में

मैं समझता हूँ ये खाई नहीं जाने वाली


चीख़ निकली तो है होंठों से मगर मद्धम है

बण्द कमरों को सुनाई नहीं जाने वाली


तू परेशान है, तू परेशान न हो

इन ख़ुदाओं की ख़ुदाई नहीं जाने वाली


आज सड़कों पे चले आओ तो दिल बहलेगा

चन्द ग़ज़लों से तन्हाई नहीं जाने वाली

Sheena
11-06-2011, 07:33 AM
तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे
मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे
तुम्हारे बस में अगर हो तो भूल जाओ हमें
तुम्हें भूलने में शायद मुझे ज़माना लगे
हमारे प्यार से जलने लगी है ये दुनिया
दुआ करो किसी दुश्मन की बद्दुआ न लगे
न जाने क्या है उस्सकी बेबाक आंखों में
वो मुँह छुपा के जाए भी तो बेवफा न लगे
जो डूबना है तो इतने सुकून से डुबो
के आस-पास की लहरों को भी पता न लगे
हो जिस अदा से मेरे साथ बेवफ़ाई कर
के तेरे बाद मुझे कोई बेवफा न लगे
वो फूल जो मेरे दामन से हो गए मंसूब
खुदा करे उन्हे बाज़ार की हवा न लगे
तुम आँख मूँद के पी जाओ ज़िन्दगी 'कैसर'
के एक घूँट में शायद ये बद-मज़ा न लगे

Krish13
11-06-2011, 07:40 AM
शीना जी आपका तो जबाब नही बढ़िया प्रस्तुति के लिये ++रेपो स्वीकार करो

ENIGMA-
12-06-2011, 06:37 PM
खुदी को कर इतना बुलंद बन्दे, की हर तकदीर से पहले
खुदा तुझ से पूछे बोल तेरी रजा क्या है
अक्लमंदी को कर इतना बुलंद बन्दे, की हर जवाब से पहले
तू उससे पूछे इस तकदीर की सजा क्या है
सजा न हो ऐसी तकदीर, कभी बनायीं नहीं उसने
फिर भी वो रजा न पूछे तो मजा क्या है

Sheena
18-07-2011, 07:24 AM
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी


ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-क़रार
बेक़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी

चश्म-ए-क़ातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसे अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी

उनकी आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू
के तबीयत मेरी माइल कभी ऐसी तो न थी

अक्स-ए-रुख़-ए-यार ने किस से है तुझे चमकाया
ताब तुझ में माह-ए-कामिल कभी ऐसी तो न थी

क्या सबब तू जो बिगड़ता है "ज़फ़र" से हर बार
ख़ू तेरी हूर-ए-शमाइल कभी ऐसी तो न थी

Sheena
18-07-2011, 07:25 AM
बीच में पर्दा दुई का था जो हायल उठ गया
ऐसा कुछ देखा के दुनिया से मेरा दिल उठ गया

शमा ने रो रो के काटी रात सूली पर तमाम
शब को जो महफ़िल से तेरी ऐ ज़ेब-ए-महफ़िल उठ गया

मेरी आँखों में समाया उस का ऐसा नूर-ए-हक़
शौक़-ए-नज़्ज़ारा ऐ बद्र-ए-कामिल उठ गया

ऐ ज़फ़र क्या पूछता है बेगुनाह-ओ-बर-गुनह
उठ गया अब जिधर को वास्ते क़ातिल उठ गया

Sheena
18-07-2011, 07:25 AM
दिल की मेरी बेक़रारी मुझसे कुछ पूछो नहीं
शब की मेरी आह-ओ-ज़ारी मुझसे कुछ पूछो नहीं

बार-ए-ग़म से मुझ पे रोज़-ए-हिज्र में इक इक घड़ी
क्या कहूँ है कैसी भारी मुझ से कुछ पूछो नहीं

मेरी सूरत ही से बस मालूम कर लो हम-दमो
तुम हक़ीक़त मेरी सारी मुझ से कुछ पूछो नहीं

शाम से ता-सुबह जो बिस्तर पे तुम बिन रात को
मैंने की अख़्तर-शुमारी मुझ से कुछ पूछो नहीं

ऐ "ज़फ़र" जो हाल है मेरा करूँगा गर बयाँ
होगी उनकी शर्म-सारी मुझ से कुछ पूछो नहीं

Sheena
18-07-2011, 07:26 AM
ज कहियो उनसे नसीम-ए-सहर मेरा चैन गया मेरी नीन्द गई
तुम्हें मेरी न मुझको तुम्हारी ख़बर मेरा चैन गया मेरी नीन्द गई

न हरम में तुम्हारे यार पता न सुराग़ दैर में है मिलता
कहाँ जा के देखूँ मैं जाऊँ किधर मेरा चैन गया मेरी नीन्द गई

ऐ बादशाह-ए-ख़ुबाँ-ए-जहाँ तेरी मोहिनी सुरत पे क़ुर्बाँ
की मैंने जो तेरी जबीं पे नज़र मेरा चैन गया मेरी नीन्द गई

हुई बद-ए-बहारी चमन में अयाँ गुल बुटी में बाक़ी रही न फ़िज़ा
मेरी शाख़-ए-उम्मीद न लाई सँवर मेरा चैन गया मेरी नीन्द गई

ऐ बर्क़-ए-तजल्लीबहर-ए-ख़ुदा न जला मुझे हिज्र में शम्मा सा
मेरी ज़ीस्त है मिस्ल-ए-चिराग़-ए-सहर मेरा चैन गया मेरी नीन्द गई

कहता है यही रो रो के "ज़फ़र" मेरी आह-ए-रसा का हुआ न असर
तेरी हिज्र में मौत न आई अभी मेरा चैन गया मेरी नीन्द गई

Sheena
18-07-2011, 07:27 AM
खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बग़ैर
पर दिल की जान लेते हैं दिलबर कहे बग़ैर

मैं क्यूँकर कहूँ तुम आओ कि दिल की कशिश से वो
आयेँगे दौड़े आप मेरे घर कहे बग़ैर

क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें
लब को तुम्हारे लब से मिलाकर कहे बग़ैर


बेदर्द तू सुने ना सुने लेक दर्द-ए-दिल
रहता नहीं है आशिक़-ए-मुज़्तर कहे बग़ैर

तक़्दीर के सिवा नहीं मिलता कहीं से भी
दिलवाता ऐ "ज़अफ़र" है मुक़द्दर कहे बग़ैर

Sheena
18-07-2011, 07:28 AM
कीजे न दस में बैठ कर आपस की बात चीत
पहुँचेगी दस हज़ार जगह दस की बात चीत

कब तक रहें ख़ामोश के ज़ाहिर से आप की
हम ने बहुत सुनी कस-ओ-नाकस की बात चीत

मुद्दत के बाद हज़रत-ए-नासेह करम किया
फ़र्माईये मिज़ाज-ए-मुक़द्दस की बात चीत

पर तर्क-ए-इश्क़ के लिये इज़्हार कुछ न हो
मैं क्या करूँ नहीं ये मेरे बस की बात चीत

क्या याद आ गया है " ज़फ़र " पन्जा-ए-निगार
कुछ हो रही है बन्द-ओ-मुख़म्मस की बात चीत

Sheena
18-07-2011, 07:29 AM
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ

न तो मैं किसी का हबीब हूँ न तो मैं किसी का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ

मेरा रंगरूप बिगड़ गया मेरा यार मुझ से बिछड़ गया
जो चमन फ़िज़ाँ में उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ

पये फ़ातेहा कोई आये क्यूँ कोई चार फूल चढ़ाये क्यूँ
कोई आके शम्मा जलाये क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ

मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँफ़िशाँ मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बरोग की हूँ सदा मै न बड़े दुख की पुकार हूँ

Sheena
18-07-2011, 07:30 AM
स-ए-मर्ग मेरे मज़ार पर जो चिराग़ किसी ने जला दिया
उसे आह दामन-ए-बाद ने सरे शाम ही से बुझा दिया

मुझे दफ़्न करना तू जिस घड़ी तो ये उससे कहना कि ऐ परी
वो जो तेरा आशिक़-ए-ज़ार था तह-ए-ख़ाक उसे दबा दिया

दम-ए-ग़ुस्ल से मेरे पेश्तर उसे हमदमों ने ये सोच कर
कहीं जावे उसका न दिल दहल मेरी लाश पर से हटा दिया

मेरी आँख झपकी थी एक पल मेरे दिल ने चाहा कि उठ के चल
दिल-ए-बेक़रार ने ओ मियाँ वहीं चुटकी लेके जगा दिया

ज़रा उन की शोख़ी तो देखिये लिये ज़ुल्फ़-ए-ख़मशुदा हाथ में
मेरे पीछे आये दबे-दबे मुझे साँप कह के डरा दिया

मैं ने दिल दिया मैं ने जाँ दी मगर आह! तूने न क़द्र की
किसी बात को जो कहा कभी उसे चुटकियों में उड़ा दिया

Sheena
18-07-2011, 07:30 AM
शमशीर बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी है
जूड़े की गुन्धावत बहर-ए-ख़ुदा ज़ुल्फ़ों की लटक फिर वैसी है

हर बात में उसके गर्मी है हर नाज़ में उसके शोख़ी है
आमद है क़यामत चाल भरी चलने की फड़क फिर वैसी है

महरम है हबाब-ए-आब-ए-रवा सूरज की किरन है उस पे लिपट
जाली की ये कुरती है वो बला गोटे की धनक फिर वैसी है

वो गाये तो आफ़त लाये है सुर ताल में लेवे जान निकाल
नाच उस का उठाये सौ फ़ितने घुन्घरू की छनक फिर वैसी है

Sheena
18-07-2011, 07:31 AM
यार था गुलज़ार था बाद-ए-सबा थी मैं न था
लायक़-ए-पा-बोस-ए-जाँ क्या हिना थी मैं न था

हाथ क्यों बाँधे मेरे छल्ला अगर चोरी हुआ
ये सरापा शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना थी मैं न था

मैं ने पूछा क्या हुआ वो आप का हुस्न-ओ-शबाब
हँस के बोला वो सनम शान-ए-ख़ुदा थी मैं न था

मैं सिसकता रह गया और मर गये फ़रहाद-ओ-क़ैस
क्या उन्हीं दोनों के हिस्से में क़ज़ा थी मैं न था

Sheena
19-07-2011, 05:01 AM
ये करें या वो करें ऐसा करें वैसा करें
ज़िन्दगी दो दिन की है दो दिन में हम क्या क्या करें

जी में आता है कि दें पर्दे से पर्दे का जवाब
हम से वो पर्दा करें दुनिया से हम पर्दा करें

सुन रहा हूँ कुछ लुटेरे आ गये हैं शहर में
आप जल्दी बन्द अपने घर का दरवाज़ा करें

इस पुरानी बेवफ़ा दुनिया का रोना कब तलक
आईये मिल-झुल के इक दुनिया नई पैदा करें

Sheena
19-07-2011, 05:02 AM
कोई ला सको तो लाओ मेरा वो हसीं ज़माना
जिसे मैं ने कुछ न समझा जिसे मैं ने कुछ न जाना

मुझे ग़म नहीं है इस का कि बदल गया ज़माना
मेरी ज़िन्दगी के मालिक कहीं तुम बदल न जाना

मेरे पास वक़्त थोड़ा मेरे वाक़्यात लम्बे
कहाँ सर-गुज़श्त अपनी न सुनो मेरा फ़साना

मुझे याद आज भी है जो करम हुआ है मुझ पे
मुझे ग़म अभी है ताज़ा मेरे सामने न आना

ये अन्धेरी रात में तुम कहाँ जा रहे हो तन्हा
न तुम्हारी राह रोके कहीं बे-अदब ज़माना


जहाँ ठहरे क़ल्ब-ए-मुज़्तर वो "नज़ीर" मेरी मन्ज़िल
जहाँ रुक के साँस ले लूँ वहीं अब मेरा ठिकाना

Sheena
19-07-2011, 05:03 AM
कभी ख़ामोश बैठोगी कभी कुछ गुनगुनाओगी
मैं उतना याद आऊँगा मुझे जितना भुलाओगी

कोई जब पूछ बैठेगा ख़ामोशी का सबब तुम से
बहुत समझाना चाहोगी मगर समझा न पाओगी

कभी दुनिया मुक़म्मल बन के आयेंगी निगाहों में
कभी मेरी कभी दुनिया की हर एक रैन बिताओगी

कहीं पर भी रहें हम तो मुहब्बत फिर मुहब्बत है
तुम्हें हम याद आयेंगे हमें तुम याद आओगी

Sheena
19-07-2011, 05:04 AM
ये इनायतें ग़ज़ब की ये बला की मेहरबानी
मेरी ख़ैरियत भी पूछी किसी और की ज़ुबानी

मेरा ग़म रुला चुका है तुझे बिखरी ज़ुल्फ़ वाले
ये घटा बता रही है कि बरस चुका है पानी

तेरा हुस्न सो रहा था मेरी छेड़ ने जगाया
वो निगाह मैंने डाली कि सँवर गई जवानी

मेरी बेज़ुबान आँखों से गिरे हैं चन्द क़तरे
वो समझ सके तो आँसू न समझ सके तो पानी

Sheena
19-07-2011, 05:10 AM
यूँ ही बेसबब न फिरा करो, कोई शाम घर भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके चुपके पढ़ा करो


कोई हाथ भी न मिलायेगा, जो गले मिलोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो


अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो


मुझे इश्तहार सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियाँ
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो


कभी हुस्न-ए-पर्दानशीं भी हो ज़रा आशिक़ाना लिबास में
जो मैं बन-सँवर के कहीं चलूँ, मेरे साथ तुम भी चला करो


ये ख़िज़ा की ज़र्द-सी शाम में, जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आंसुओं से हरा करो


नहीं बेहिजाब वो चाँद सा कि नज़र का कोई असर नहीं
उसे तनी गर्मि-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो

Sheena
19-07-2011, 05:11 AM
ये चिराग़ बेनज़र है ये सितारा बेज़ुबाँ है
अभी तुझसे मिलता जुलता कोई दूसरा कहाँ है

वही शख़्स जिसपे अपने दिल-ओ-जाँ निसार कर दूँ
वो अगर ख़फ़ा नहीं है तो ज़रूर बदगुमाँ है

कभी पा के तुझको खोना कभी खो के तुझको पाना
ये जनम जनम का रिश्ता तेरे मेरे दरमियाँ है

मेरे साथ चलनेवाले तुझे क्या मिला सफ़र में
वही दुख भरी ज़मीं है वही ग़म का आस्माँ है

मैं इसी गुमाँ में बरसों बड़ा मुत्मइन रहा हूँ
तेरा जिस्म बेतग़ैय्युर है मेरा प्यार जाविदाँ है

उंहीं रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे
मुझे रोक रोक पूछा तेरा हमसफ़र कहाँ है

Sheena
19-07-2011, 05:11 AM
ये चाँदनी भी जिन को छूते हुए डरती है
दुनिया उंहीं फूलों कोपैरों से मसलती है

शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है

लोबान में चिंगारी जैसे कोई रख दे
यूँ याद तेरी शब भर सीने में सुलगती है

आ जाता है ख़ुद खेँच कर दिल सीने से पटरी पर
जब रात की सरहद से इक रेल गुज़रती है

आँसू कभी पलकों पर ता देर नहीं रुकते
उड़ जाते हैं उए पंछी जब शाख़ लचकती है

ख़ुश रंग परिंदों के लौट आने के दिन आये
बिछड़े हुए मिलते हैं जब बर्फ़ पिघलती है

Sheena
19-07-2011, 05:12 AM
वो थका हुआ मेरी बाहों में ज़रा सो गया था तो क्या हुआ
अभी मैंने देखा है चाँद भी किसी शाख़-ए-गुल पे झुका हुआ

जिसे ले गई है अभी हवा वो वरक़ था दिल की किताब का
कहीं आँसुओं से मिटा हुआ कहीं आँसुओं से लिखा हुआ

कई मील रेत को काट कर कोई मौज फूल खिला गई
कोई पेड़ प्यास से मर रहा है नदी के पास खड़ा हुआ

मुझे हादसों से सजा सजा के बहुत हसीन बना दिया
मेरा दिल भी जैसे दुल्हन का हाथ हो मेहदियों से रचा हुआ

वही ख़त के जिस पे जगह जगह दो महकते होंठों के चाँद थे
किसी भूले-बिसरे से ताक़ पर तह-ए-गर्द होगा दबा हुआ

वही शहर है वही रास्ते वही घर है और वही लान भी
मगर उस दरीचे से पूछना वो दरख़्त अनार का क्या हुआ

मेरे साथ जुगनू है हमसफ़र मगर इस शरर की बिसात क्या
ये चराग़ कोई चराग़ है न जला हुआ न बुझा हुआ

Sheena
19-07-2011, 05:13 AM
सोचा नहीं अछा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं
मांगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं

देखा तुझे सोचा तुझे चाहा तुझे पूजा तुझे
मेरी ख़ता मेरी वफ़ा तेरी ख़ता कुछ भी नहीं

जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाये रात भर
भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं

इक शाम की दहलीज़ पर बैठे रहे वो देर तक
आँखों से की बातें बहुत मूँह से कहा कुछ भी नहीं

दो चार दिन की बात है दिल ख़ाक में सो जायेगा
जब आग पर काग़ज़ रखा बाकी बचा कुछ भी नहीं

अहसास की ख़ुश्बू कहाँ, आवाज़ के जुगनू कहाँ
ख़ामोश यादों के सिवा, घर में रहा कुछ भी नहीं

Sheena
19-07-2011, 05:14 AM
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा
इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जायेगा

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जायेगा

कितनी सच्चाई से मुझसे ज़िन्दगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जायेगा

मैन ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तों
ज़हर भी इस मे अगर होगा दवा हो जायेगा

रूठ जाना तो मोहब्बत की अलामत है मगर
क्या ख़बर थी मुझ से वो इतना ख़फ़ा हो जायेगा

Sheena
19-07-2011, 05:15 AM
पत्थर के जिगर वालों ग़म में वो रवानी है
ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है

फूलों में ग़ज़ल रखना ये रात की रानी है
इस में तेरी ज़ुल्फ़ों की बे-रब्त कहानी है

एक ज़हन-ए-परेन्शाँ में वो फूल सा चेहरा है
पत्थर की हिफ़ाज़त में शीशे की जवानी है

क्यों चाँदनी रातों में दरिया पे नहाते हो
सोये हुए पानी में क्या आग लगानी है

इस हौसला-ए-दिल पर हम ने भी कफ़न पहना
हँस कर कोई पूछेगा क्या जान गवानी है

रोने का असर दिल पर रह रह के बदलता है
आँसू कभी शीशा है आँसू कभी पानी है

ये शबनमी लहजा है आहिस्ता ग़ज़ल पढ़ना
तितली की कहानी है फूलों की ज़बानी है

Sheena
19-07-2011, 05:15 AM
न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की

उजालों की परियाँ नहाने लगीं
नदी गुनगुनाई ख़यालात की

मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई
ज़ुबाँ सब समझते हैं जज़्बात की

सितारों को शायद ख़बर ही नहीं
मुसाफ़िर ने जाने कहाँ रात की

मुक़द्दर मेरे चश्म-ए-पुर'अब का
बरसती हुई रात बरसात की

Sheena
19-07-2011, 05:16 AM
मेरे साथ तुम भी दुआ करो यूँ किसी के हक़ में बुरा न हो
कहीं और हो न ये हादसा कोई रास्ते में जुदा न हो

मेरे घर से रात की सेज तक वो इक आँसू की लकीर है
ज़रा बढ़ के चाँद से पूछना वो इसी तरफ़ से गया न हो

सर-ए-शाम ठहरी हुई ज़मीं, आसमाँ है झुका हुआ
इसी मोड़ पर मेरे वास्ते वो चराग़ ले कर खड़ा न हो

वो फ़रिश्ते आप ही ढूँढिये कहानियों की किताब में
जो बुरा कहें न बुरा सुने कोई शख़्स उनसे ख़फ़ा न हो

वो विसाल हो के फ़िराक़ हो तेरी आग महकेगी एक दिन
वो गुलाब बन के खिलेगा क्या जो चराग़ बन के जला न हो

मुझे यूँ लगा कि ख़ामोश ख़ुश्बू के होँठ तितली ने छू लिये
इन्हीं ज़र्द पत्तों की ओट में कोई फूल सोया हुआ न हो

इसी एहतियात में मैं रहा, इसी एहतियात में वो रहा
वो कहाँ कहाँ मेरे साथ है किसी और को ये पता न हो

pelu pinka
25-07-2011, 01:22 PM
khan bhai kamal ki gajal hai

pelu pinka
25-07-2011, 01:23 PM
kamal ka collectin hai apka

Teach Guru
26-07-2011, 12:42 AM
बहुत ही जबरदस्त सूत्र है मित्र| इनको भी कोई समझने वाला चाहिए........

Akhand
26-07-2011, 07:37 AM
करे दरिया न पुल मिस्मार मेरे
अभी कुछ लोग हैं उस पार मेरे

बहुत दिन गुज़रे अब देख आऊँ घर को
कहेंगे क्या दर-ओ-दीवार मेरे

वहीं सूरज की नज़रें थीं ज़ियादा
जहाँ थे पेड़ सायादार मेरे

वही ये शहर है तो शहर वालो
कहाँ है कूचा-ओ-बाज़ार मेरे

तुम अपना हाल-ए-महजूरी सुनाओ
मुझे तो खा गये आज़ार मेरे

जिन्हें समझा था जानपरवर मैं अब तक
वो सब निकले कफ़न बरदार मेरे

गुज़रते जा रहे हैं दिन हवा से
रहें ज़िन्दा सलमात यार मेरे

दबा जिस से उसी पत्थर में ढल कर
बिके चेहरे सर-ए-बाज़ार मेरे

दरीचा क्या खुला मेरी ग़ज़ल का
हवायें ले उड़ी अशार मेरे

Akhand
26-07-2011, 07:37 AM
मिट्टी की इमारत साया देकर मिट्टी में हमवार हुई
वीरानी से अब काम है और वीरानी किसकी यार हुई

डर-डर के क़दम यूँ रखता हूँ ख़्वाबों के सहरा में
ये रेग अभी ज़ंजीर बनी ये चाँव अभी दीवार हुई

हर पत्ती बोझिल हो के गिरी सब शाख़ें झुक कर टूट गईं
उस बारिश ही से फ़सल उजड़ी जिस बारिश से तैयार हुई

अब ये भी नहीं है बस में के हम फूलों की डगर पर लौट चलें
जिस राहगुज़र पर चलना है वो राहगुज़र तलवार हुई

छूती है ज़रा जब तन को हवा चुभते हैं रगों में काँटें से
सौ बार ख़िज़ाँ आई होगी महसूस मगर इस बार हुई

वो नाले हैं बेताबी के चीख़ उठता है सन्नाटा भी
ये दर्द की शब मालूम नहीं कब तक के लिये बेदार हुई

लिखी हैं शिकस्तें इतनी जहाँ मक़्तल में वहाँ ये भी लिख दो
कितनी शमशीरें टूट गईं कितने दुश्मनों की हार हुई

अब ग़ैर हवा कितनी ही चले अब गर्म फ़िज़ा कितनी ही रहे
सीने का ज़ख़्म चराग़ बना दामन की आग बहार हुई

Akhand
26-07-2011, 07:40 AM
उसने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया
हिज्र की रात बाम पर माह-ए-तमाम रख दिया

आमद-ए-दोस्त की नवीद कू-ए-वफ़ा में आम थी
मैं ने भी इक चिराग़-सा दिल सर-ए-शाम रख दिया

देखो ये मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैं
मैंने तो सब हिसाब-ए-जाँ बरसर-ए-आम रख दिया

उसने नज़र नज़र में ही ऐसे भले सुख़न कहे
मैंने तो उस के पाँवों में सारा कलाम रख दिया

शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मैकशी रही
उसने जो फेर ली नज़र मैंने भी जाम रख दिय

और 'फ़राज़' चाहिये कितनी मुहब्बतें तुझे
के माओँ ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया

Akhand
26-07-2011, 07:42 AM
उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ

ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़
ऐ मर्ग-ए-नागहाँ तेरा आना बहुत हुआ

हम ख़ुल्द से निकल तो गये हैं पर ऐ ख़ुदा
इतने से वाक़ये का फ़साना बहुत हुआ

अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी
उस से ज़रा–सा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ

अब क्यों न ज़िन्दगी पे मुहब्बत को वार दें
इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ

अब तक तो दिल क दिल से ताअर्रुफ़ न हो सका
माना कि उस से मिलना मिलाना बहुत हुआ

क्या क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल
ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ

कहता था नासेहों से मेरे मुंह न आईओ
फिर क्या था एक हू का बहाना बहुत हुआ

लो फिर तेरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र
अह्मद 'फ़राज़' तुझ से कहा ना बहुत हुआ

Akhand
28-07-2011, 06:57 AM
जब से तेरे बदन के गुलाब आस-पास हैं
लगता है सब ख़जान-ए-ख्वाब आस-पास हैं

जैसे धुले-धुलाए खड़े हों हज़ूर-ए-यार
दिल आइने के चश्मा-ए-आब आस-पास है

अपने ख़याल-ओ-ख्वाब के अंबार के तले
खुश हैं के सब हमारे सराब आस-पास हैं

अब भी हम अपने आप से कुछ दूर-दूर हैं
अब भी वही सवाल-ओ-जवाब आस-पास हैं

या हम ही हो गए हैं तही-दस्त१ इन दिनों
या ज़िन्दगी के सारे हिसाब आस-पास हैंa

Akhand
28-07-2011, 06:59 AM
वो बस्तियाँ, वो बाम, वो दर कितनी दूर हैं
महताब, तेरे चाँद नगर कितनी दूर हैं

वो ख्वाब जो ग़ुबार-ए-गुमा१ में नजर न आये
वो ख्वाब तुझसे दीदा-ए-तर कितनी दूर है

बाम-ए-ख्याल-ए-यार२ से उतरे तो ये खुला
हमसे हमारे साम-ओ-सहर कितनी दूर हैं

ऐ आसमान इनको जहाँ होना चाहिए
उस ख़ाक से ये ख़ाकबसर३ कितनी दूर हैं

बैठे-बिठाये दिल के सफर पर निकल तो आये
लेकिन वो मेहरबान-ए-सफर कितनी दूर हैं

ये भी ग़ज़ल तमाम हुई, शाम हो चुकी
अफ्सून-ए-शायरी४ के हुनर कितनी दूर हैं

Akhand
28-07-2011, 07:01 AM
वो बस्तियाँ, वो बाम, वो दर कितनी दूर हैं
महताब, तेरे चाँद नगर कितनी दूर हैं

वो ख्वाब जो ग़ुबार-ए-गुमा१ में नजर न आये
वो ख्वाब तुझसे दीदा-ए-तर कितनी दूर है

बाम-ए-ख्याल-ए-यार२ से उतरे तो ये खुला
हमसे हमारे साम-ओ-सहर कितनी दूर हैं

ऐ आसमान इनको जहाँ होना चाहिए
उस ख़ाक से ये ख़ाकबसर३ कितनी दूर हैं

बैठे-बिठाये दिल के सफर पर निकल तो आये
लेकिन वो मेहरबान-ए-सफर कितनी दूर हैं

ये भी ग़ज़ल तमाम हुई, शाम हो चुकी
अफ्सून-ए-शायरी४ के हुनर कितनी दूर हैं

chetna9319
12-12-2011, 07:52 AM
शानदार ..........................

jjojjy18
12-12-2011, 06:11 PM
बेमिशाल कलेक्शन !धन्यवाद मित्र !इसके लिए मेरी तरफ से रेपो+++++++++ कबूल करें !

lotus1782
12-12-2011, 06:22 PM
बहुत बढ़िया संग्रह है

Badtameez
12-12-2011, 07:42 PM
बहुत खूब ..................

Akhand
08-01-2012, 07:10 AM
उजड़े हुए चमन का, मैं तो बाशिंदा हूँ
कोई साथ है तो लगता है, मैं भी अभी ज़िंदा हूँ

ज़िंदगी अब लगती है, बस इक सूनापन
जब से बिछडे हुए हैं, तुमसे हम
जान अब तो तेरे लिए ही, बस मैं ज़िंदा हूँ

ज़िंदगी के सफ़र में, तेरे साथ हैं हम
मैंने सोचा है बस, बस तेरे हैं हम
होके तुमसे जुदा, मैं कैसे कहूँ ज़िंदा हूँ

यार अब तो तेरे ही, सपने देखते हैं हम
ख़्वाब में कहते हो मुझसे, कि तेरे हैं हम
कुछ मजबूरी है सनम, जो मैं शर्मिंदा हूँ

Akhand
08-01-2012, 07:10 AM
दूर तक निगाह में खामोशियाँ हैं
सामने गुलाब है पर वो जाने कहाँ हैं

गुलाब की खुशबू गुलाब-सी रंगत
है जिनके पास वो जाने कहाँ हैं

ख़्वाबों में आते हैं जो ख़्वाब बनकर
मैं ढूँढूँ उन्हें पर वो जाने कहाँ हैं

मेरे ख़्वाब उनकी ही गलियों में खोये
हम जिनमें खोये वो जाने कहाँ हैं
दूर तक निगाह में. . .

चमन में हैं फूल उनमें हूँ मैं भी
मगर जो हैं माली वो जाने कहाँ हैं

उनके संदेशे का है इंतज़ार
जो हैं डाकिए वो जाने कहाँ हैं

उठती हैं नज़रें क्यों राहों की जानिब
मेरा हमसफर तो न जाने कहाँ हैं

Akhand
08-01-2012, 07:11 AM
कहने को तो हम, खुश अब भी हैं
हम तुम्हारे तब भी थे, हम तुम्हारे अब भी हैं

रूठने-मनाने के इस खेल में, हार गए हैं हम
हम तो रूठे तब ही थे, आप तो रूठे अब भी हैं

मेरी ख़ता बस इतनी है, तुम्हारा साथ चाहता हूँ
तब तो पास होके दूर थे, और दूरियाँ अब भी हैं

मुझसे रूठ के दूर हो, पर एहसास तो करो
प्यासे हम तब भी थे, प्यासे हम अब भी हैं

इस इंतज़ार में मेरा क्या होगा, तुम फिक्र मत करना
सुकून से हम तब भी थे, सुकून से हम अब भी हैं

बस थोड़ा रूठने के अंजाम से डरते हैं
डरते हम तब भी थे, डरते हम अब भी हैं

हमारी तमन्ना कुछ ज़्यादा नहीं थी, जो पूरी न होती
कम में गुज़ारा तब भी था, कम में गुज़ारते अब भी हैं

चलते हैं तीर दिल पे कितने, जब तुम रूठ जाते हो
ज़ख्मी हम तब भी थे, ज़ख्मी हम अब भी हैं

मेरी मासूमियत को तुम, ख़ता समझ बैठे हो
मासूम हम तब भी थे, मासूम हम अब भी हैं

आप हमसे रूठा न करें, बस यही इल्तिजा है
फ़रियादी हम तब भी थे, फ़रियादी हम अब भी हैं

तुम हो किस हाल में, कम से कम ये तो बता दो
बेखब़र हम तब भी थे, बेखब़र हम अब भी हैं

Akhand
08-01-2012, 07:12 AM
पेड़ की छाँव में, बैठे-बैठे सो गए
तुमने मुसकुरा कर देखा, हम तेरे हो गए

तमन्ना जागी दिल में, तुम्हें पाने की
तुम्हें पा लिया, और खुद तेरे हो गए

कब तलक यों ही, दूर रहना पड़ेगा
इस सोच में डूबे-डूबे, दुबले हो गए

बिन पत्तों की, उस डाली को देखा
तसव्वुर किया तुम्हारा, और कवि हो गए

यों ही बैठे रहे, सोचते रहे, हर पल
ख़यालों में तुम आते रहे, हमनशीं हो गए

राज़दार मेरे बनकर, ज़िंदगी में आ गए
रहनुमा बन गए, खुद राज़ हो गए

कोई फूल देखूँ, तो लगता है तुम हो
फिर फूल का क्या करूँ, खुद फूल हो गए

नसीब की कमी है, गुलाब सहता नहीं
पर तुम्हीं ख़यालों में, इक हँसी गुलाब हो गए

बेकरारी बढ़ती है, जब तुम याद आते हो
याद मैं करता नहीं, फिर भी याद आ गए

तुम्हारे लिए है, ये ज़िंदगी मेरी
ख़्वाहिश में तुम्हारी, हम लाचार हो गए

तड़प-तड़प के, एक-एक पल, मुश्किल से बीतते हैं
एक पल बीता, ऐसा लगे, कई साल हो गए

Akhand
08-01-2012, 07:13 AM
अंधेरे में साये के साथ तुम्हारे
करते हैं बातें, हम दिल से हैं हारे

मिलते नहीं कभी, साये अंधेरे में
फिर भी कोशिश करते हैं, हम दिल से हैं हारे

तुम्हारी याद में, डूबा रहूँ हमेशा
अब तो सनम, तेरी यादों के सहारे

कभी न कभी, तुमसे मुलाक़ात होगी
फिर निकालेंगे दिल के, अरमान सारे

अभी हाल ये है, कि नींद नहीं आती
कभी मौत भी नहीं आएगी, बिन तुम्हारे

तमन्ना करूँ तो क्या करूँ, डर लगता है
टूटे हैं अब तक के, सभी ख़्वाब हमारे

दिल में आवाज़ आती है, तुम भी सुनो
दिल नहीं लगता है पर क्या कहें, दिल से हैं हारे

दूर रहकर हम और, क़रीब होते गए
फ़ासले और बढ़ते गए, बीच हमारे-तुम्हारे

पागलपन, दीवानगी, क्या है ये सब
दिए हुए तोहफ़े, हमारे पास हैं तुम्हारे

तुम दिल में रहते हो, हम क्या करें
आपका साथ मिला हमें, किस्मत के सहारे

किस्मत में क्या है, आगे हम न जानें
किस्मत ही घटाएगी अब दूरी, बीच की हमारे-तुम्हारे

devkala
08-01-2012, 10:35 PM
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

न शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंदख़ू क्या है

ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसे
वरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो चार
ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है

बना है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में "ग़ालिब" की आबरू क्या है

devkala
08-01-2012, 10:36 PM
हाथों में हाथ डाले जो हंसा करते थे कभी
दूर खड़े मुस्कुराते नज़र आते हैं

संजोते थे सपने एक साथ कभी जो
अब अपने अपने सपनो के साथ नज़र आते हैं

खूब खेला है खेल जज्बातों का ये ऊपर वाले ने
लोग तो वही रहते हैं बस रिश्तों के नाम बदल जाते हैं

devkala
08-01-2012, 10:37 PM
समंदर में लहरें उठती हैं यूँ तो रोज़ हज़ारों
पर किनारे तक बहुत कम पहुँच पाती हैं
जुनून होना चाहिए इंसान में आगे बढ़ने का
लकीरें हाथ पर खुद-ब-खुद बन जाती हैं

devkala
08-01-2012, 10:38 PM
बना रस्ते चलने की आदत सी है भंवर में अब
तूफ़ान से उबरने की उम्मीद, मुकद्दर ने ना की है
पर रोज़ जी उठती है मर के कमबख्त फिर से
ज़िन्दगी, तुझे जीने की चाह, हर पल बाकी है

raniloveu
09-01-2012, 12:18 AM
very nice :book:

satya_anveshi
16-03-2012, 05:53 PM
भाई अखंड जी! आपने बहुत अच्छा सूत्र बनाया है, मैं भी ऐसा एक सूत्र बनाने वाला था परंतु थोड़ा खोजने पर आपका सूत्र मिल गया और अब मैं इसी सूत्र को आगे बढाऊँगा।
मित्रों! आज यह सूत्र पुनः शुरू कर रहा हूँ, आपका साथ अपेक्षित है।

Badtameez
16-03-2012, 06:12 PM
भाई अखंड जी! आपने बहुत अच्छा सूत्र बनाया है, मैं भी ऐसा एक सूत्र बनाने वाला था परंतु थोड़ा खोजने पर आपका सूत्र मिल गया और अब मैं इसी सूत्र को आगे बढाऊँगा।
मित्रों! आज यह सूत्र पुनः शुरू कर रहा हूँ, आपका साथ अपेक्षित है।

बेन भाई! इस सूत्र को आगे अवश्य बढाइए, लेकिन एक विनती है- आप शायरी प्रविष्टी में शायर का नाम लिखना मत भूलिएगा। ऐसा करना शायर के प्रति श्रद्धांजलि होगी और ऐसा न करना शायर का अपमान (व्यक्तिगत विचार)।

Kamal Ji
16-03-2012, 06:42 PM
बेन भाई! इस सूत्र को आगे अवश्य बढाइए, लेकिन एक विनती है- आप शायरी प्रविष्टी में शायर का नाम लिखना मत भूलिएगा। ऐसा करना शायर के प्रति श्रद्धांजलि होगी और ऐसा न करना शायर का अपमान (व्यक्तिगत विचार)।

जरूरी नही है सब शायर सिधार ही चुके होंगे ...अगर शायर जीवित हो तो.............. श्रधान्जली न कह कर हम यह कहें कि उनका सम्मान होगा उनका नाम साथ में लिखने से.
आशा है अप अन्यथा न लेंगे.

satya_anveshi
16-03-2012, 07:01 PM
बेन भाई! इस सूत्र को आगे अवश्य बढाइए, लेकिन एक विनती है- आप शायरी प्रविष्टी में शायर का नाम लिखना मत भूलिएगा। ऐसा करना शायर के प्रति श्रद्धांजलि होगी और ऐसा न करना शायर का अपमान (व्यक्तिगत विचार)।


जरूरी नही है सब शायर सिधार ही चुके होंगे ...अगर शायर जीवित हो तो.............. श्रधान्जली न कह कर हम यह कहें कि उनका सम्मान होगा उनका नाम साथ में लिखने से.
आशा है अप अन्यथा न लेंगे.

सुरेश भाई और अनु जी! इसका उत्तर आपको मिलेगा................................ . और अवश्य ही मिलेगा।http://antarvasna.com/forum/images/smilies/BangHead.gif

Badtameez
16-03-2012, 07:27 PM
जरूरी नही है सब शायर सिधार ही चुके होंगे ...अगर शायर जीवित हो तो.............. श्रधान्जली न कह कर हम यह कहें कि उनका सम्मान होगा उनका नाम साथ में लिखने से.
आशा है अप अन्यथा न लेंगे.

आप ही की बात सही है। त्रुटि के लिए क्षमा चाहता हूँ।

Badtameez
16-03-2012, 07:30 PM
सुरेश भाई और अनु जी! इसका उत्तर आपको मिलेगा................................ . और अवश्य ही मिलेगा।http://antarvasna.com/forum/images/smilies/BangHead.gif

बहुत-बहुत धन्यवाद!

satya_anveshi
16-03-2012, 07:44 PM
बहुत-बहुत धन्यवाद!

क्या सुरेश भाई, सारा का सारा मजा खराब कर दिया! मैं गुस्सा हो रहा हूँ और आप धन्यवाद कर रहे हैं। लगता है आपके हस्ताक्षर का आप पर बहुत प्रभाव है।

Badtameez
16-03-2012, 07:47 PM
क्या सुरेश भाई, सारा का सारा मजा खराब कर दिया! मैं गुस्सा हो रहा हूँ और आप धन्यवाद कर रहे हैं। लगता है आपके हस्ताक्षर का आप पर बहुत प्रभाव है।

गुस्सा क्यों हैं बेन भाई? उत्तर देने के बाद यह चर्चा यहीं बन्द कर दीजिएगा नहीं तो सूत्र भटक जाएगा।

satya_anveshi
16-03-2012, 07:55 PM
नमस्कार दोस्तों! मैं हूँ आप का नया होस्ट और दोस्त, बेन टेन; एक बार फिर से स्वागत है आपका खूबसूरत ग़ज़लोँ से सजे सूत्र में; कुछ ग़ज़लें एक प्रेमी की अपनी प्रेमिका के लिए होंगी तो कुछ इंसानियत के वास्ते, किसी ग़ज़ल में टूटे दिल का दर्द होगा तो कोई में किसी सामाजिक बुराई का प्रतिकार लिए होगी। कुल मिलाकर कहा जाए तो ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जो आपके दिल को छू जाती है। आइए शुरू करते हैं नाम लेकर भगवान श्री गणेश का-

जय गणेश!

satya_anveshi
16-03-2012, 08:55 PM
सबसे पहले एक नज़र डालते हैं ग़ज़ल पर...................... आख़िर क्या है ये.....
यह अरबी साहित्य की प्रसिद्ध काव्य विधा है जो बाद में फ़ारसी, उर्दू, और हिंदी साहित्य में भी बेहद लोकप्रिय हुई। संगीत के क्षेत्र में इस विधा को गाने के लिए इरानी और भारतीय संगीत के मिश्रण से अलग शैली निर्मित हुई।
ग़ज़ल शब्द का अर्थ


अरबी भाषा के इस शब्द का अर्थ है औरतों से या औरतों के बारे में बातें करना। ग़ज़ल में मुख्य रूप से औरतों के बारे में कहा जाता है। एक ग़ज़ल को 'जुदाई का दर्द और उस दर्द के बावजूद प्यार की खूबसूरती की एक काव्यात्मक अभिव्यक्ति' के रूप में समझा जा सकता है।


एक ग़ज़ल के अवयव (ग़ज़ल का स्वरूप)


ग़ज़ल शेरों से बनती है। हर शेर में दो पंक्तियाँ होती हैं। शेर की हर पंक्ति को 'मिसरा' कहते हैं। एक ग़ज़ल में 5 से लेकर 25 तक शेर हो सकते हैं। ग़ज़ल की खा़स बात यह है कि उसका प्रत्येक शेर अपने आप में एक सम्पूर्ण कविता होता है और उसका संबंध ग़ज़ल में आने वाले अगले-पिछले अथवा अन्य शेरों से हो ,यह ज़रुरी नहीं। इसका अर्थ यह हुआ कि किसी ग़ज़ल में अगर 25 शेर हों तो यह कहना गलत न होगा कि उसमें 25 स्वतंत्र कवितायें हैं; किंतु कभी-कभी एक से अधिक शेर मिलकर अर्थ देते हैं। ऐसे शेर 'कता बंद' कहलाते हैं। शेर के पहले मिसरे को ‘मिसर-ए-ऊला’ और दूसरे शेर को ‘मिसर-ए-सानी’ कहते हैं।
किसी ग़ज़ल के निम्नलिखित अवयव होते है-
1 मत्ला
2 क़ाफिया
3 रदीफ़
4 मक्ता
5 बहर, वज़्न या मीटर(meter)
5.1 छोटी बहर
5.2 मध्यम बहर
5.3 लंबी बहर
6 हासिले-ग़ज़ल
7 हासिले-मुशायरा

मत्ला
ग़ज़ल के पहले शेर को ‘मत्ला’ कहते हैं। इसके दोनो मिसरों में यानि पंक्तियों में ‘काफिया’ होता है। अगर ग़ज़ल के दूसरे शेर की दोनों पंक्तियों में का़फ़िया तो उसे ‘हुस्ने मत्ला’ या ‘मत्ला-ए-सानी’ कहा जाता है।

क़ाफिया
वह शब्द जो मत्ले की दोनों पंक्तियों में और हर शेर की दूसरी पंक्ति में रदीफ़ के पहले आये उसे ‘क़ाफ़िया’ कहते हैं। क़ाफ़िया अलग अर्थ में आ सकता है, लेकिन यह ज़रूरी है कि उसका उच्चारण समान हो, जैसे बर, गर, तर, मर, डर, अथवा मकाँ,जहाँ,समाँ इत्यादि।

रदीफ़
प्रत्येक शेर में ‘का़फ़िये’ के बाद जो शब्द आता है उसे ‘रदीफ’ कहते हैं। पूरी ग़ज़ल में रदीफ़ एक होती है। ऐसी ग़ज़लों को ‘ग़ैर-मुरद्दफ़-ग़ज़ल’ कहा जाता है।

मक़्ता
ग़ज़ल के आख़री शेर को जिसमें शायर का नाम अथवा उपनाम हो उसे ‘मक़्ता’ कहते हैं। अगर नाम न हो तो उसे केवल ग़ज़ल का ‘आखरी शेर’ ही कहा जाता है। शायर के उपनाम को ‘तख़ल्लुस’ कहते हैं।

निम्नलिखित ग़ज़ल के माध्यम से अभी तक ग़ज़ल के बारे में लिखी गयी बातें समझ आ जाएंगी; तो पेश-ए खिदमत है................ मिर्ज़ा ग़ालिब की एक ग़ज़ल...

कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती

आगे आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती

हम वहां हैं जहां से हमको भी
कुछ हमारी खबर नहीं आती

काबा किस मुंह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुमको मगर नहीं आती

इस ग़ज़ल का ‘क़ाफ़िया’ बर, नज़र, भर, ख़बर, मगर है। इस ग़ज़ल की ‘रदीफ़' "नहीं आती" है। यह हर शेर की दूसरी पंक्ति के आख़िर में आयी है। ग़ज़ल के लिये यह अनिवार्य है। इस ग़ज़ल के प्रथम शेर को ‘मत्ला’ कहेंगे क्योंकि इसकी दोनों पंक्तियों में ‘रदीफ़’ और ‘क़ाफ़िया’ है। सब से आख़री शेर ग़ज़ल का ‘मक़्ता’ कहलायेगा क्योंकि इसमें ‘तख़ल्लुस’ है।

बहर, वज़्न या मीटर(meter)

शेर की पंक्तियों की लंबाई के अनुसार ग़ज़ल की बहर नापी जाती है। इसे वज़्न या मीटर भी कहते हैं। हर ग़ज़ल उन्नीस प्रचलित प्रचलित बहरों में से किसी एक पर आधारित होती है। बोलचाल की भाषा में सर्वसाधारण ग़ज़ल तीन बहरों में से किसी एक में होती है-
छोटी बहर
अहले दैरो-हरम रह गये। तेरे दीवाने कम रह गये।
मध्यम बहर
उम्र जल्वों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं। हर शबे-ग़म की सहर हो ज़रूरी तो नहीं।।
लंबी बहर
ऐ मेरे हमनशीं चल कहीं और चल इस चमन में अब अपना गुज़ारा नहीं। बात होती गुलों की तो सह लेते हम अब तो कांटों पे भी हक़ हमारा नहीं।।

यानि कि किसी ग़ज़ल की एक पंक्ति की लंबाई ही उसका मीटर कहलाती है।

हासिले-ग़ज़ल
शेर-ग़ज़ल का सबसे अच्छा शेर ‘हासिले-ग़ज़ल-शेर’ कहलाता है।

हासिले-मुशायरा
ग़जल-मुशायरे में जो सब से अच्छी ग़जल हो उसे ‘हासिले-मुशायरा ग़जल’ कहते हैं।




ग़ज़ल के प्रकार
तुकांतता के आधार पर ग़ज़लें दो प्रकार की होती है-
मुअद्दस ग़जलें- जिन ग़ज़ल के अशारों में रदीफ और काफिया दोनों का ध्यान रखा जाता है।
मुकफ़्फ़ा ग़ज़लें- जिन ग़ज़ल के असारों में केवल काफिया का ध्यान रखा जाता है।


इतिहास

अरबी में
ग़ज़लों का आरंभ अरबी साहित्य की काव्य विधा के रूप में हुआ। अरबी भाषा में कही गइ ग़ज़लें वास्तव में नाम के ही अनुरूप थी अर्थात उसमें औरतों से बातें या उसके बारे में बातें होती थी।

फ़ारसी में
अरबी से फारसी साहित्य में आकर यह विधा शिल्प के स्तर पर तो अपरिवर्तित रही किंतु कथ्य की दृष्टि से वे उनसे आगे निकल गई। उनमें बात तो दैहिक या भौतिक प्रेम की ही की गई किंतु उसके अर्थ विस्तार द्वारा दैहिक प्रेम को आध्यात्मिक प्रेम में बदल दिया गया। अरबी का इश्के मज़ाजी फारसी में इश्के हकीकी हो गया। फारसी ग़ज़ल में प्रेमी को सादिक (साधक) और प्रेमिका को माबूत (ब्रह्म) का दर्जा मिल गया। ग़ज़ल को यह रूप देने में सूफी साधकों की निर्णायक भूमिका रही। सूफी साधना विरह प्रधान साधना है। इसलिए फ़ारसी ग़ज़लों में भी संयोग के बजाय वियोग पक्ष को ही प्रधानता मिली।

उर्दू में
फ़ारसी से उर्दू में आने पर भी ग़ज़ल का शिल्पगत रूप ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया गया लेकिन कथ्य भारतीय हो गया। दक्किनी उर्दू के ग़ज़लकारों ने अरबी फारसी के बदले भारतीय प्रतीकों, काव्य रूढ़ियों, एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को लेकर रचना की। उस समय उत्तर भारत में राजकाज की भाषा उर्दू थी इसलिए ग़ज़ल जब उत्तर भारत में आइ तो पुनः उसपर फारसी का प्रभाव बढ़ने लगा। ग़ालिब जैसे उर्दू के श्रेष्ठ ग़ज़लकार भी फारसी ग़ज़लों को ही महत्वपूर्ण मानते रहे और उर्दू ग़जल को फारसी के अनुरूप बनाने की कोशिश करते रहे। बाद में दाद के दौर में फारसी का प्रभाव कुछ कम हुआ। इकबाल की आरंभिक ग़ज़लें इसी प्रकार की है। बाद में राजनीतिक स्थितियों के कारण उर्दू ग़ज़लों पर फारसी का प्रभाव पुनः बढ़ने लगा। 1947 के बाद इसमें पुनः कमी आने लगी।


हिंदी में
हिंदी के अनेक रचनाकारों ने इस विधा को अपनाया। जिनमें निराला, शमशेर, बलबीर सिंह रंग, भवानीशंकर, जानकी वल्लभ शास्त्री, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, त्रिलोचन आदि प्रमुख हैं। किंतु इस क्षेत्र में सर्वाधिक प्रसिद्धि दुष्यंत कुमार को मिली।


प्रमुख ग़ज़लकार
मिर्जा असदुल्ला खाँ 'ग़ालिब'
मीर तक़ी 'मीर'
फ़िराक़ गोरखपुरी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
दुष्यंत कुमार


कुछ ग़ज़ल गायक
जगजीत सिंह
ग़ुलाम अली
बेग़म अख़्तर
मेहदी हसन
चंदन दास
हरिहरन
मुन्नी बेगम
भूपेंद्र सिंह
पीनाज़ मसानी
पंकज उधास

satya_anveshi
16-03-2012, 09:35 PM
गुस्सा क्यों हैं बेन भाई? उत्तर देने के बाद यह चर्चा यहीं बन्द कर दीजिएगा नहीं तो सूत्र भटक जाएगा।

अरे सुरेश भाई मैं तो मज़ाक कर रहा था, आप तो वाकई भोले हो..........
मैंने आपकी और अनु जी की सलाह का उत्तर दे दिया है (ऊपर की पोस्ट में) । दरअसल ग़ज़लों में शायर आखिरी शेर में अपना नाम स्वतः ही लिख देते हैं इस लिए मुझे कोई अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी होगी....... ही ही हा........

satya_anveshi
17-03-2012, 04:57 PM
नमस्कार दोस्तों, आज की ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ, 'ये दिल ये पागल दिल मेरा'

बोल हैं मोहसिन नक़वी और स्वरबद्ध किया है ग़ुलाम अली जी ने।
पेश-ए-ख़िदमत है-

ये दिल ये पागल दिल मेरा

अंदाज़ अपने देखते हैं आईने में वो
और ये भी देखते हैं कि कोई देखता न हो।

ये दिल, ये पागल दिल मेरा क्यों बुझ गया, आवारगी
इस दश्त में इक शहर था वो क्या हुआ, आवारगी।
कल शब मुझे बेशक्ल सी आवाज़ ने चौंका दिया
मैंने कहा तू कौन है उसने कहा आवारगी।
इक अजनबी झोंके ने जब पूछा मेरे ग़म का सबब
सहरा की भीगी रेत पर मैंने लिखा आवारगी।
ये दर्द की तनहाइयाँ, ये दश्त का वीराँ सफ़र
हम लोग तो उकता गये अपनी सुना, आवारगी।
कल रात तनहा चाँद को देखा था मैंने ख़्वाब में
‘मोहसिन’ मुझे रास आएगी शायद सदा आवारगी।

दश्त = रेगिस्तान
शब = रात
सबब = कारण

Badtameez
17-03-2012, 06:19 PM
मित्रों आइए कवि गोपालदास 'नीरज' जोकि एक सफल फिल्मी गीतकार भी हैं, की एक गजल पढें।
.
अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए,
जिसमे इंसान को इंसान बनाया जाए!
.
जिसकी खुशबू से महक जाये पडोसी का भी घर,
फुल इस किस्म का हर सिम्त खिलाया जाए !
.
आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी,
कोई बताए कहा जाके नहाया जाए !

.
प्यार का खून हुआ क्यों ये समझने के लिए,
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए !

.
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर ऐसा,
मै रहू भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए !
.
जिस्म दो होके भी दिल एक हो अपने ऐसे,
मेरा आसू तेरी पलकों से उठाया जाए !
.
गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रुबाई है दुखी,
ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए !

.
.
– गोपालदास ‘नीरज’

satya_anveshi
17-03-2012, 06:56 PM
वाह! सुरेश भाई बहुत खूब।

Badtameez
17-03-2012, 07:23 PM
वाह! सुरेश भाई बहुत खूब।

धन्यवाद आपको विचार बताने के लिए।
और कवि नीरज जी को गजल रचाने के लिए।

satya_anveshi
19-03-2012, 09:37 AM
आदाब दोस्तों! आज मैं जो ग़ज़ल पेश करने जा रहा हूँ, बड़ी ही दिलकश ग़ज़ल है; आप भी सुनेँगे तो

'अरे ग़ज़्ज़ब!!'

बोलने से खुद को नहीं रोक पाएँगे। वैसे आप में से ज्यादातर मित्रों ने इसे सुना जरूर होगा क्योंकि यह सरफ़रोश फिल्म की वही खूबसूरत ग़ज़ल है, 'होश वालों को खबर क्या'
बोल है निदा फज़ली के और अपनी आवाज दी है जगजीत सिंह जी ने।

होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है
उनसे नज़रें क्या मिलीं रोशन फ़िज़ाएं हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है
होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है
खुलती ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शायरी
झुकती आँखों ने बताया मयक़शी क्या चीज़ है
होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है
हम लबों से कह न पाए उनसे हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है
होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है



दोस्तों आप इस ग़ज़ल को यहाँ से (http://files4.fm420.com/music1/Sarfarosh/Hoshwalon%20Ko%20Khabar%20Kya.mp3) डाउनलोड कर सकते हैं।
आप को यह पोस्ट कैसी लगी अपनी टिप्पणी जरूर दें।

Badtameez
19-03-2012, 09:49 AM
आदाब दोस्तों! आज मैं जो ग़ज़ल पेश करने जा रहा हूँ, बड़ी ही दिलकश ग़ज़ल है; आप भी सुनेँगे तो

'अरे ग़ज़्ज़ब!!'

बोलने से खुद को नहीं रोक पाएँगे। वैसे आप में से ज्यादातर मित्रों ने इसे सुना जरूर होगा क्योंकि यह सरफ़रोश फिल्म की वही खूबसूरत ग़ज़ल है, 'होश वालों को खबर क्या'
बोल है निदा फज़ली के और अपनी आवाज दी है जगजीत सिंह जी ने।

होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है
उनसे नज़रें क्या मिलीं रोशन फ़िज़ाएं हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है
होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है
खुलती ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शायरी
झुकती आँखों ने बताया मयक़शी क्या चीज़ है
होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है
हम लबों से कह न पाए उनसे हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है
होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है



दोस्तों आप इस ग़ज़ल को यहाँ से (http://files4.fm420.com/music1/Sarfarosh/Hoshwalon%20Ko%20Khabar%20Kya.mp3) डाउनलोड कर सकते हैं।
आप को यह पोस्ट कैसी लगी अपनी टिप्पणी जरूर दें।

अर्रे गज्जब! मस्त है लेकिन मैं समझता था कि इसके रचनाकार जावेद अख्तर साहब है क्योंकि सरफरोश फिल्म के अन्य गीतों को अख्तर साहब ने ही लिखा है।

Badtameez
20-03-2012, 12:46 PM
गुलाम अली ने ये ग़ज़ल गाया है। शायर हैं -अकबर इलाहाबादी
.
हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सीजो पी ली है
डाका तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है।
.
ना-तजुर्बाकारी से, वाइज़ की ये बातें हैं
इस रंग को क्या जाने, पूछो तो कभी पी है
.
उस मय से नहीं मतलब दिल जिससे हो बेगाना
मकसूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है।
.
वां दिल में कि दो सदमे,यां जी में कि सब सह लो
उन का भी अजब दिल है, मेरा भी अजब जी है
.
हर ज़र्रा चमकता है, अनवर-ए-इलाही से
हर साँस ये कहती है, कि हम हैं तो ख़ुदा भी है
.
सूरज में लगे धब्बा, फ़ितरत के करिश्मे हैं
बुत हम को कहें काफ़िर, अल्लाह की मर्ज़ी है
.
-अकबर इलाहबादी

satya_anveshi
21-03-2012, 10:43 PM
दोस्तों, आज की ग़ज़ल एक ऐसे मरहूम शायर की है जो इस फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध से दूर रहा परंतु उसकी ग़ज़लों की रूमानियत हमें खींच लाती है.............
पेश-ए-ख़िदमत है शायर साबिर इंदौरी की एक रचना..............




हिज्र की सब का सहारा भी नहीं
अब फलक पर कोई तारा भी नहीं

बस तेरी याद ही काफी है मुझे
और कुछ दिल को गवारा भी नहीं

जिसको देखूँ तो मैं देखा ही करूँ
ऐसा अब कोई नजारा भी नहीं

डूबने वाला अजब था कि मुझे
डूबते वक्त पुकारा भी नहीं

कश्ती ए इश्क वहाँ है मेरी
दूर तक कोई किनारा भी नहीं

दो घड़ी उसने मेरे पास आकर
बारे गम सर से उतारा भी नहीं

कुछ तो है बात कि उसने साबिर
आज जुल्फों को सँवारा भी नहीं।



(ये साबिर इंदौरी की उन आखिरी ग़ज़लों में से एक है, जिसे उन्होंने कहीं नहीं पढ़ा, किसी को नहीं सुनाया।)

Akhand
12-03-2013, 07:18 AM
तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है
ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते

जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का
उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते

ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना
बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते

बिसाते -इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते

'वसीम' जहन बनाते हैं तो वही अख़बार
जो ले के एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते

Akhand
12-03-2013, 07:20 AM
उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटें
सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक आँखों में त'अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Akhand
12-03-2013, 07:21 AM
उड़ान वालो उड़ानों पे वक़्त भारी है
परों की अब के नहीं हौसलों की बारी है

मैं क़तरा हो के तूफानों से जंग लड़ता हूँ
मुझे बचाना समंदर की ज़िम्मेदारी है

कोई बताये ये उसके ग़ुरूर-ए-बेजा को
वो जंग हमने लड़ी ही नहीं जो हारी है

दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत
ये एक चराग़ कई आँधियों पे भारी है

Akhand
12-03-2013, 07:22 AM
कितना दुश्वार है दुनिया ये हुनर आना भी
तुझी से फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी

ऐसे रिश्ते का भरम रखना बहुत मुश्किल है
तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी

Akhand
12-03-2013, 07:23 AM
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे

घर सजाने का तस्सवुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे

क़हक़हा आँख का बर्ताव बदल देता है
हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आयें कैसे

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा
एक क़तरे को समुन्दर नज़र आयें कैसे